For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

“इससे अच्छा तो मैं अपने जीवन का ही अन्त कर लूं , अब क्या रखा है इस जीवन में . बेटी ने भाग कर शादी कर ली और बिरादरी में मेरी नाक कटा दी , एक लड़का है जिससे कुछ उम्मीदें थीं पर वो भी अब आवारा ही निकल गया , उसकी बद्तमीजियां दिन पर दिन बढती ही जा रही हैं. पत्नी भी सीधे मुह बात नहीं करती.” इस प्रकार सार्जेंट अभिलाष के जीवन जीने की अभिलाषा सामाप्त होती जा रही थी. हर पल वो सोच के समन्दर में डूबता जा रहा था और उतना ही अवसाद (डिप्रेशन) उसपर हावी होता जा रहा था. वो कहते हैं ना कि विपत्तियां आती हैं तो हर तरफ से आनी शुरू हो जाती हैं. आजकल सेक्शन में भी एम डब्लू ओ आई सी साहब कुछ नाराज़ नाराज़ से रहते हैं और किसी के भी सामने कुछ भी कहने लगते हैं. ये सब बातें शेयर करने के लिए भी कोई न था सो अपने आप से ही सार्जेंट अभिलाष जैसे बातें कर रहा था.

      सालों कि सर्विस के बाद अभिलाष का शरीर वैसे तो स्वस्थ दिखता था परन्तु ब्लड प्रेशर व हाइपरटेंशन ने उसके शरीर में घर बना लिया था. “सोचता हूँ कि सर्विस से रिटायरमेंट ले लूँ.....पर फिर क्या करूँगा खाली बैठने से तो काम नहीं चलेगा अगर बाहर दूसरी नौकरी की तो हालत पतली हो जाएगी.” ऐसे ख़याल उसके मन में आते जाते रहते थे. उस दिन तो इन्तेहाँ ही हो गई जब उसे पता चला उसका अपना लड़का स्कूल जाने के बजाय आवारा लड़कों के साथ घूमता है और उसका अटेंडेंस बहुत ही कम होने के कारण उसे परीक्षा में बैठने से मना किआ जा रहा है. और तो और उसने शराब और सिगरेट पीना भी शुरू कर दिया है. ये बातें पता  चलने पर अभिलाष आग बबूला हो गया और बेटे को डांटने लगा. पर बेटा कहाँ सुनने वाला था, सुनना तो दूर उसने बाप को ही भला बुरा कहना शुरू कर दिया और कहा कि अब मैं बड़ा हो गया हूँ जो चाहूँ करूँ. ऐसी बातें कहकर वह पैर पटककर और दरवाज़ा गुस्से से खोलकर चलता बना.

      आज अभिलाष को लगा कि जीवन का अंत कर लेना ही सबसे सरल रास्ता है. ब्लड प्रेशर बढ़ने पर इस प्रकार के विचार अक्सर आने लगते थे पर इस बार यह विचार केवल कुछ समय के लिए ही नहीं रहा वरन अभिलाष इसे कार्यरूप में परिवर्तित करने के लिए विचार करने लगा.

      अभिलाष हेलिकॉप्टर यूनिट में था तथा शाम को मेसेज मिला कि उत्तराखण्ड में आई  आपदा के मिशन वाले दल में उसका भी नाम है. उसके दिमाग़ में तो फितूर पहले से ही चल रहा था, उसने सोचा कि चलो अब देवभूमि में ही चलकर प्राण त्याग दिए जाएँगे. वहीँ हेलिकॉप्टर के ब्लेड से स्वाहा हो जाऊंगा. और किसी की तो फिकर नहीं पर पत्नी को जीते जी कुछ न दे पाया शायद मरकर ही कुछ काम आ सकूँ.

      आज उसके जीवन कि आखिरी रात थी. उसने अपने पूरे जीवन को याद किया. आलमारी में से उसने अपनी पुरानी एल्बम निकाली और पुरानी फोटो निहारने लगा. देखते-देखते वह अपनी शादी के समय की फोटो पर पहुंचा.

“कितना खुश हुआ करता था मैं, जाने किसकी नज़र लग गई.” उसने उत्तराँचल वाली फोटो देखी जहाँ शादी के बाद वह पत्नी के साथ घूमने गया था. उसे याद आया कि उसने वहां कितना बढ़िया वक़्त गुज़ारा था. फिर वो डिनर वाली फोटो आई. दरअसल जिस होटल में वो ठहरा था उसका मालिक सेना के लोगों का बड़ा मुरीद था, रही होगी कोई बात. उसी वक़्त होटल की पांचवी वर्षगाँठ भी थी. “होटल के मालिक ने अपनी तरफ से उपहार स्वरुप हमें उस रात डिनर कराया था, नफ़ासत की तो कोई कमी ही न थी. आजकल तो उसका होटल उत्तराँचल का सर्वश्रेष्ठ तथा पांचसितारा होटल है. वह आजकल एक बहुत ही प्रसिद्ध आदमी है.”

      इसप्रकार वह उस दुखदाई शाम का पूरा आनंद लेता गया और ज्यादा किसी से कुछ न बोला. अगले दिन ठीक से नहा-धोकर तैयार हुआ पर हर काम करना उसे बेमानी लाग रहा था. सबकुछ यथावत हुआ तथा वह मिशन राहत में शामिल हुआ. उत्तराँचल के ऊपर से उसका जहाज गुजर रहा था, “वाकई कुदरत ने कहर बरपा दिया है, जिसे जो चाहिए उसे वह नहीं मिलता, यहीं देख लो.” वह इन बातों को सोचता रहा और खिड़की से बाहर झांकता रहा तभी उसका जहाज़ एक पठार पर लैंड किया. अबतक ज्यादातर लोग रेस्क्यू किए जा चुके थे, उन्हें अब बाकी लोगों का पता लगाना था. रेस्क्यू टीम काम पे लग गई, सार्जेंट अभिलाष भी अपनी आखिरी अभिलाषा पूरी करने की योजना में था तभी उसे एक आवाज़ सुनाई दी. हेलीकॉप्टर के ब्लेड रुक चुके थे चारों तरफ बिल्कुल शांती थी उस शांती को भंग करती वह आवाज़ पुनः आई.

“आ....ह ..............बचा..ओ.”

अभिलाष उस दिशा में बढ़ चला.

“यह क्या किसी के जूते लगते हैं, अरे हाँ पूरा पैर ही है. ओह माई गॉड यह तो कोई आदमी है जो मलबे में पूरी तरह से दबा हुआ है.”

उसने देखा तो उसके साथी थोड़ी दूर जा चुके थे, तुरंत ही उसने उस शरीर पर से मलबा हटाना शुरू कर दिया. पूरा शरीर बुरी तरह जख्मी था, कई हड्डियाँ टूट चुकी थीं पता नहीं जीवित कैसे था. उसके मुंह पर लकड़ी का तख्ता पड़ा हुआ था शायद इसी वजह से उसका उसका सिर सुरक्षित बचा था और वह किसी तरह से सांस ले पाया था. इतनी बुरी तरह जख्मी होने के बावजूद अपनी अधखुली आँखों से उसने अभिलाष को देखा और जीवन कि उमंग उसके शरीर में दौड़ गई.

“अरे यह क्या ये तो वही आदमी है. वही होटल का मालिक.” अभिलाष स्तब्ध रह गया. वह मलबा और तेजी से हटाने लगा और सारा मलबा हटाने के बाद उसे थरमस से पानी पिलाया. अरे..... जिस आदमी के मुह से अभी आह नहीं निकल रही थी वो अब बात करने के लिए तैयार था. चार दिनों तक मलबे में दबे रहने के बाद भी यह जिजीविषा?

“साहब आपकी यह जंगल वाली वर्दी देखते ही मुझे पता चल गया कि मेरी जान बच गई.” घायल ने अधखुली आँख को थोड़ा और खोलते हुए कहा.

“पर आपका तो पूरा होटल और घर सब पानी में बह गया है.” अभिलाष ने आश्चर्य मिश्रित निराशा से कहा.

“कोई बात नहीं साहब, जान है तो जहान है. असल में आप लोगों से मुझे बहुत प्रेरणा मिलती है, जिस तरह आप लोग विकट परिस्तिथियों में भी अपना काम करते हो..........आह...”

पर वास्तव में तो प्रेरणा किसी और को ही मिल रही थी. तबतक बाकी साथी भी सहयोग के लिए आ गए. अभिलाष के मन में अब नई अभिलाषाएं आ गईं, उसने सोचा कि वाकई पृथ्वी गोल है क्योंकि जिस बिंदु को मैं अन्त समझ रहा था वो तो प्रारम्भ निकला.

(मुकेश राय)

स्क्वाड्रन लीडर

"मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 567

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Squadron Leader Mukesh Rai on May 25, 2014 at 10:11am
आशुतोष जी तथा सौरभ जी मेरा साधुवाद स्वीकार करें...

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 23, 2014 at 3:07am

समसामयिक घटना को आधार बना कर लिखी गयी एक अच्छी कथा के लिए हार्दिक बधाई लें, आदरणीय. यह कथा जीवन के प्रति उत्साहित करती है.

शुभेच्छाएँ

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 15, 2014 at 4:43pm

आदरणीय मुकेश जी ....साहित्य का उद्देश्य वाकई यही है ..बेहद खूबसूरत सदेश समाहित किये इस रचना पर मेरी तरफ से तहे दिल बधाई ..सादर

Comment by Squadron Leader Mukesh Rai on May 12, 2014 at 10:29pm
शकूर साहब कोटि-कोटि धन्यवाद।
मीना मैडम हौसलाफजाई के लिए शुक्रिया।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 12, 2014 at 9:32am

जहाँ व्यक्ति अपने आप निराश होता है वहाँ उसे खुद के बारे में न सोच दूसरों के बारे में सोचना चाहिये शायद वो अपने न सही दूसरों के अंदर एक आशा संचार कर सके इसी बहाने खुद को भी जीने की वजह मिल जायेंगी, जान का क्या है जब जाना हो चली जायेगी।
आदरणीय Squadron Leader Mukesh Rai सर बेहतरीन रचना है निराशा से शुरुआत हुई और एक मकसद पर जाकर खत्म हुई, बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Meena Pathak on May 11, 2014 at 10:36pm

प्रेरणा प्रद 

Comment by Squadron Leader Mukesh Rai on May 11, 2014 at 4:12pm

Please give your precious comments/feedback about the story.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Shyam Narain Verma commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"नमस्ते जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Monday
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Jul 26
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Jul 24

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service