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ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

२२ २२ २२ २२

क्या तुमने ये सोचा पगली
गर मैं तेरा होता पगली

तेरी यादें फूलों जैसी
कांटे होते रोता पगली

इन आँखों के वादे पढ़कर
बन बैठा मैं झूठा पगली

मैं तो तेरा साया हूँ ,अब
तू है मेरी काया पगली

तेरी बातें तू ही जाने
मैं तो हूँ बस तेरा पगली

राहों पर यूँ नज़र बिछाना
गुमनाम करे दीवाना पगली


मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 27, 2014 at 12:44pm

बढ़िया ग़ज़ल हुई है 

मतले में शुतुर्गुर्बा का ऐब बन रहा है ..... तुम के साथ तेरा के कारण ...देख लीजियेगा 

प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

Comment by gumnaam pithoragarhi on May 20, 2014 at 8:29pm

dhanywaad sir ji

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 20, 2014 at 5:16pm

पगली को अंत iतक अच्छे से निभाया i  बधाई i

Comment by gumnaam pithoragarhi on May 20, 2014 at 3:49pm

शुक्रिया दोस्तो आपने सराहा कोशिश कामयाब हुई

Comment by vijay nikore on May 20, 2014 at 12:10pm

गज़ल अच्छी कही है। बधाई, आदरणीय।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 19, 2014 at 8:36pm

आदरणीय गुमनाम भाई , बहुत खूब सूरत गज़ल कही है , आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by Sarita Bhatia on May 19, 2014 at 6:23pm

वाह खुबसूरत 

Comment by gumnaam pithoragarhi on May 18, 2014 at 2:29pm

thanx dosto

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 17, 2014 at 2:06pm

आदरणीय गुमनाम जी इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई सादर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 16, 2014 at 11:04pm

वाह! क्या खूब गजल हुई आदरणीय गुमनाम जी, दिली बधाइयाँ आपको

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