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मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो

जुल्फ हैं लहराते तेरे बदली जैसे

और तुम …..

मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो...

केशुओं से झांकते तेरे नैन दोनों

प्याले मदिरा के उफनते लग रहे

काया-कंचन ज्यों कमलदल फिसलन भरे

नैन-अमृत-मद ये तेरा छक पियें

बदहवाशी मूक दर्शक मै खड़ा

तुम इशारों से ठिठोली कर रही हो

जुल्फ हैं लहराते तेरे बदली जैसे

और तुम ..

मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो

इस सरोवर में कमल से खेलती

चूमती चिकने दलों ज्यों हंसिनी

नीर झर-झर तेरे लव से यों झरें

चूम कर मोती बनाऊं मन करे

मै हूँ चातक तू है चंदा दूर क्यों

छटपटाता चांदनी से मन जले

जुल्फ हैं लहराते तेरे बदली जैसे

और तुम ..

मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो

इस सरोवर में झुकी जब खेल खेले लहर से

देख सब कुछ कांपते अधरों से सारे ये कमल

तू कमलिनी राज सुंदरता करे दिखता यहां

तार वीणा ....मेरा मन झंकृत करे

होश में आऊँ तो गाऊँ प्रेम-धुन मै री सखी

काश नजरें हों इनायत इस नजर से आ मिलें

जुल्फ हैं लहराते तेरे बदली जैसे

और तुम ..

मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो

भोर की स्वर्णिम किरण तू स्वर्ण सी

है सुनहली सर की आभा स्वर्ग सी

देव-मानव सब को प्यारी अप्सरा सी

नृत्य छन-छन पग के घुँघरू जब करें

मन मयूरा नाचता विह्वल सा ये

मोरनी सी तू थिरकती क्यों फिरे

जुल्फ हैं लहराते तेरे बदली जैसे

और तुम ..

मुस्कुराती दामिनी सी छल रही हो

.

मौलिक व अप्रकाशित

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर '५

कुल्लू हिमाचल २४.५.२०१४

५.४५-६.१० पूर्वाह्न

Views: 768

Comment

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 27, 2014 at 11:38am

मनोरम श्रंगार भाव है  i माँ को छूते है i बधाई i

Comment by Shyam Narain Verma on May 26, 2014 at 5:28pm
बहुत सुंदर रचना, बधाई आदरणीय................

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