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गजल-पीठ पर वो बार करने का हुनर

आँसुओं से हम गजल लिखते रहे
कागजों में दर्द बन बिकते रहे

वो पराये हो चुके थे अब तलक

और हम अपना समझ झुकते रहे

पीठ पर वो बार करने का हुनर
उम्र भर हम याद ही करते रहे

हद से ज्यादा हम हुये जब गमजदा 
बारबा वो खत तेरा पढ़ते रहे 

तू गया कितने जलाकर आशना

आशना वो आज तक जलते रहे

हम समझ कर आदमी को आदमी
साथ हम शैतान के चलते रहे

उमेश कटारा

मौलिक व अप्रकाशित
 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 18, 2014 at 1:40am

बधायी स्वीकारें आदरणीय..

सुझाव समीचीन हैं..

सादर

Comment by umesh katara on June 11, 2014 at 12:49pm

शुक्रिया डा.प्राची सिंह जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 10, 2014 at 10:38pm

बहुत मर्मस्पर्शी भाव समेटे हैं इन अशआरों में आ० उमेश कटारा जी 

बहुत बहुत बधाई 

मतले में इता दोष के साथ ही अंतिम शेर में हम काफिया शब्द भी सही नहीं है..एक बार देख लें 

Comment by umesh katara on June 9, 2014 at 9:58pm

shukriya coontee mukerji ji  

apka

Comment by umesh katara on June 9, 2014 at 9:57pm

शुक्रिया narendrasinh chauhan sahb

Comment by coontee mukerji on June 8, 2014 at 3:49pm

हम समझ कर आदमी को आदमी
साथ हम शैतान के चलते रहे....हमारे आसपास कितने असमाजिक तत्व घूमते रहते हैंलेकिन हम जान नहीं पाते हैं.अच्छी गजल के लिए दाद कूबूल करें.

Comment by umesh katara on June 8, 2014 at 8:07am

आदरणीय शिज्जू शंकर जी शुक्रिया ,,कृपया स्पष्ट इंगित करें मेरी गजल के दोष वगैरह की जानकारी कम ही है सर

Comment by umesh katara on June 8, 2014 at 8:06am

शुक्रिया राजेश कुमारी जी

Comment by umesh katara on June 8, 2014 at 8:05am

शुक्रिया दीपिका जी

Comment by umesh katara on June 8, 2014 at 8:05am

शुक्रिया मीना पाठक जी

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