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 एक 
और तभी होता है ये आभास 
गिन गिन कर लेते है
एक एक
श्वांस 
तोड़ कर पिंजड़ा 
उड़ता है एक पंछी 
और छाया मंडराती है
यहीं आसपास 
 
दो
 
एक कोई 
माघ की रात में गला 
जेठ की घाम में जला 
उसने हर बार 
घर दिया 
उसे 
खलिहान ही मिला  

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Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on February 28, 2011 at 11:30pm

ganesh ji abhaar


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 28, 2011 at 8:50pm
अश्वनी जी , दोनों कवितायेँ सुंदर भाव समेटे है , बधाई |
Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on February 23, 2011 at 10:46am
आभार विवेक जी 
Comment by विवेक मिश्र on February 23, 2011 at 1:44am
दूसरी कविता तो एकदम गज़ब की है. माँ शारदे की कृपा यूँ ही बरसे. जय हो..!

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