For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

जिसको तुमने खोया माना-डा० विजय शंकर

जिसको तुमने खोया माना है ,
उसको मैंने पाया जाना है ।
कुछ अटपटा , उलटा सा लगता है ,
पर जिन्दगीं तुमको मैंने ऐसा ही जाना है
जो खो गया , वो क्या ले गया ,
हाँ, अपनी स्मृतियाँ छोड़ गया ||
कुछ मीठी , कुछ तीखी,
पर जीने के लिए बहुत
काफी है , एक सहारे की तरह ||
एक गीत , एक कविता लिखता हूँ ,
जब तक लिखता हूँ , मेरा है , जब
छोड़ देता हूँ , पढ़ने वालों के लिए,
मेरा क्या रह गया उसमें , पर
खो दिया, क्या मैंने उसको ,
गर खो दिया , तो वही तो पाना है ,
जिसको औरों ने गवाना जाना है ||
---+------+-----+-----+---
मानव रह गया समेटते ,
कहाँ समेट पाया सारा ,
जब अपना खोया सारा
उस दिन पाया जग सारा ||

मौलिक एवं अप्रकाशित
डा० विजय शंकर

Views: 668

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 27, 2014 at 10:01am
आदरणीय डॉ o प्राची सिंह जी , रचना आपको पसंद आयी , उसके लिए और आपकी बधाइयों के किये बहुत बहुत धन्यवाद ।
आपने मेरी इस छोटी सी रचना को गीता के दर्शन से जोड़ दिया , कहाँ गीता और कंहाँ ये चार पंक्तियाँ । पर फिर सोंचता हूँ कि कर्म के मामले में गीता का आदर्श तो सर्वत्र लागू है , फिर यह रचना उससे इतर कैसे हो सकती है । अत: इसके लिए भी आपका बहुत बहुत आभार | सादर.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 26, 2014 at 3:47pm

आ० डॉ० विजय शंकर जी 

जीवन में खोने-पाने के एहसास को लेकर कई कई दार्शनिकों नें बहुत बड़ी बड़ी बातें की ......हर इंसान का अनुभवों के सापेक्ष अपना ही मानना होता है..

लेकिन 'गीता' से जो दर्शन है.......// तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो? तुमने जो लिया यहीं से लिया , जो दिया यहीं पर दिया//... उसपर चिंतन बुद्धि मन भाव सभी को सदिश करता है.

.....हर आगत अनुभव में समृद्धि ही तो है और प्रयोजन पूर्ण होने के बाद विगत हो जाती है.

ऐसी ही समृद्ध वैचारिकता को स्वर देती आपकी प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारिये 

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 22, 2014 at 10:38am
धन्यवाद , जितेंद्र जी , सादर।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 22, 2014 at 10:12am

जो खो गया , वो क्या ले गया ,
हाँ, अपनी स्मृतियाँ छोड़ गया ||
कुछ मीठी , कुछ तीखी,
पर जीने के लिए बहुत
काफी है , एक सहारे की तरह............बहुत सुंदर, सच! यादों के सहारे भी जीवन कट ही जाता है. हार्दिक बधाई आपको आदरणीय डा.विजय जी

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 21, 2014 at 8:15pm
आदरणीय सुश्री राजेश कुमारी जी ,
पंक्तियाँ आपको पसंद आई , आपकी स्वीकरोक्ति के लिये बहुत बहुत धन्यवाद।
सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 21, 2014 at 12:42pm

गर खो दिया , तो वही तो पाना है ,
जिसको औरों ने गवाना जाना है ||
---+------+-----+-----+---
मानव रह गया समेटते ,
कहाँ समेट पाया सारा ,
जब अपना खोया सारा
उस दिन पाया जग सारा ||गहन चिंतन के सागर में डुबकियाँ लगवाती आपकी ये रचना बहुत शानदार है ,आपको बहुत -बहुत बधाई आदरणीय 

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 21, 2014 at 9:28am
आदरणीय मीना पाठक जी ,
आपको पसंद आई , धन्यवाद ,
सादर ।
Comment by Meena Pathak on June 21, 2014 at 8:58am

बहुत सुन्दर रचना .. सादर बधाई 

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 20, 2014 at 1:10am
आ o मुकर्जी जी,
आपको रचना अच्छी लगी बहत बहुत धन्यवाद
सादर .
Comment by Dr. Vijai Shanker on June 20, 2014 at 1:09am
आ o कल्पना रामानी जी,
आपको रचना अच्छी लगी बहत बहुत धन्यवाद
सादर .

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दोहे -रिश्ता
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी रिश्तों पर आधारित आपकी दोहावली बहुत सुंदर और सार्थक बन पड़ी है ।हार्दिक बधाई…"
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"तू ही वो वज़ह है (लघुकथा): "हैलो, अस्सलामुअलैकुम। ई़द मुबारक़। कैसी रही ई़द?" बड़े ने…"
Monday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"गोष्ठी का आग़ाज़ बेहतरीन मार्मिक लघुकथा से करने हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह…"
Monday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"आपका हार्दिक आभार भाई लक्ष्मण धामी जी।"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"आ. भाई मनन जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई।"
Monday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"ध्वनि लोग उसे  पूजते।चढ़ावे लाते।वह बस आशीष देता।चढ़ावे स्पर्श कर  इशारे करता।जींस,असबाब…"
Sunday
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"स्वागतम"
Mar 30
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Mar 29
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अजय जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Mar 29
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Mar 29
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Mar 29
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
Mar 29

© 2025   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service