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फुसफुसाहट नफरतों की तेज फिर होने लगी - ग़ज़ल

2122  2122  2122  212

**************************

एक भी उम्मीद उन  से  तुम न पालो दोस्तो

रास्ता  इन  बीहड़ों  में  खुद  बना  लो दोस्तो

***

बंद दरवाजे जो  दस्तक से  नहीं खुलते कभी

इंतजारी  से  तो  अच्छा  तोड़  डालो  दोस्तो

***

फुसफुसाहट नफरतों की तेज फिर होने लगी

प्यार का परचम  दुबारा तुम उठा लो दोस्तो

***

होश में तो  कह  रहे  थे ‘साथ  हम तेरे खड़े’

गिर रहा मदहोशियों  में अब सॅभालो दोस्तो

***

मौत से  बढ़कर  पहेली  जिंदगी हमको लगी

हल पहेली  का  तो कोई तुम निकालो दोस्तो

***

करके कद  छोटा  किसी का तो  बडे़ होते नहीं

वास्ते इसके  स्वयं  का   कद बढ़ा लो दोस्तो

***

                      (रचना-१५ जून २०१४)

***

मौलिक और अप्रकाशित

( लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 9, 2014 at 11:46am

आ0 भाई सौरभ जी , उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद . इंगित कमियों को ठीक कर लिया गया है .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2014 at 12:51am

कई शेर अच्छे हुए हैं... बधाई..

दोस्तो की जगह कई शेरों में दोस्तों  हो गया है. दुरुस्त कर लें, भाईजी.

शुभेच्छाएँ

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 27, 2014 at 12:00pm

आ० प्राची बहन उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार l


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 26, 2014 at 6:53pm

बंद दरवाजे जो  दस्तक से  नहीं खुलते कभी

इंतजारी  से  तो  अच्छा  तोड़  डालो  दोस्तों............बहुत शानदार तेवर 

मौत से  बढ़कर  पहेली  जिंदगी हमको लगी

हल पहेली  का  तो कोई तुम निकालो दोस्तो..........वाह! सुन्दर शेर 

इस सुन्दर ग़ज़ल प्रस्तुति पर मेरी हार्दिक बधाई लीजिये आ० लक्ष्मण धामी जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 23, 2014 at 10:18am

आ0 भाई गिरिराज जी गजल की प्रशंसा कर उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 23, 2014 at 10:18am

आ0 भाई गोपाल नारायण जी, गजल को एक साथ इतनी सारी उपाधियां देकर सम्मानित करने के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद । आपको गजल इतनी अच्छी लगी यह मेरा सौभाग्य है । मेरी कलम को आप सब का स्नेह और सम्मान मिला खुशी सौ गुना बढ़ गयी । लिखते समय हमेशा यह विचार कायम रहता है कि जो कुछ भी लिख सकूं उसे आप सभी का स्नेह और आशीष मिल सके । आप सभी की स्वीकार्यता ही मेरे लेखन की उपलब्धि है । हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 23, 2014 at 10:17am

आ0 भाई जितेन्द्र जी  आपको अशआर पसंद आये यह मेरे लिए खुशी की बाद है । उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 23, 2014 at 10:16am

आ0 भाई अभिनव अरून जी, गजल की प्रशंसा कर उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 23, 2014 at 10:16am


आ0 गीतिका जी, उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 23, 2014 at 10:15am

आ0 राजेश बहन गजल को आपकी प्रशंसा और स्नेह मिला, यह मेरा सौभाग्य है । अभी इस क्षेत्र में मीलों चलना है आप सबका सभी का स्नेहाशीष मिलता रहे जिससे कदम न लड़खडाये यही अभिलाषा है । हार्दिक धन्यवाद ।

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