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है सफ़र में काफ़िला पर रहनुमा कोई नहीं-ग़ज़ल

2122- 2122- 2122- 212

नक्श भी कोई नहीं औ' रास्ता कोई नहीं

है सफ़र में काफ़िला पर रहनुमा कोई नहीं

 

भीड़ चेहरे सिर्फ़ कहने के लिये मौजूद हैं

घूम के देखा मगर मुझको मिला कोई नहीं

 

आशनाई बस ज़रूरत की है रिश्ते नाम के

इनका अब जज़्बात से ही वास्ता कोई नहीं

 

नफ़रतों के ज़ह्र में डूबी ज़बाँ के तीर का

आदमीयत है निशाना दूसरा कोई नहीं

 

सिर्फ़ बातों से बहल जायें यहाँ कुछ लोग तो

सच सुने कोई नहीं सच देखता कोई नहीं

 

साँस में भरता धुआँ काली कबा है गर्द से

उसपे यारो ये सितम पत्ता हरा कोई नहीं

 

 

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by gumnaam pithoragarhi on July 9, 2014 at 6:37am

बहुत खूब...................................... , बधाई ..


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Comment by शिज्जु "शकूर" on July 8, 2014 at 10:54pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर आपका तहेदिल से शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 8, 2014 at 10:53pm

आदरणीय वीनस जी आपका तहेदिल से शुक्रिया

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 8, 2014 at 10:17pm
सिर्फ़ बातों से बहल जायें यहाँ कुछ लोग तो
सच सुने कोई नहीं सच देखता कोई नहीं
खूब बहुत खूब , शिज्जु शकूर जी , बधाई .
Comment by वीनस केसरी on July 8, 2014 at 8:59pm

बहुत खूब भाई क्या कहने '

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