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सूरज............
रोज निकल पडता है चहलकदमी करते
ठिठकता है कुछ देर मेरे शहर में भी
फिर चल देता है
कांधे पर कुछ यादों की गठरी लादे
देखता है मुड कर किसी शाख के पीछे से
कुछ और भी गुमसुम हो जाते हैं
दरख्तों के घने लंबे साए
पर यादें...............
जाने कहां कहां से फिर लौट कर आ जाती हैं
जिन्हें रोज ही सूखे पत्तों के साथ
समेट कर फेंक देती हूं
---------प्रियंका

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by vijay nikore on August 11, 2014 at 1:26pm

//पर यादें...............
जाने कहां कहां से फिर लौट कर आ जाती हैं
जिन्हें रोज ही सूखे पत्तों के साथ
समेट कर फेंक देती हूं//

बहुत ही दिलकश भाव हैं। हार्दिक बधाई।

Comment by Priyanka Pandey on August 11, 2014 at 7:43am

समस्त मित्रों का हर्दय से आभार

Comment by Akhand Gahmari on August 10, 2014 at 3:41pm

सुन्‍दर एवं सटीक रचना हार्दिक बधाई स्‍वीकार करें


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 10, 2014 at 1:52am

आदरणीया प्रियंकाजी, स्मृतियों में भावनाओं का सैलाब उमड़ा करता है. उन्हें शब्दों का संबल मिला नहीं के वो अदबदाया एकदम से उच्छृंखल हो उठता है. यही उच्छृंखलता तो रचनाकर्म है. आपके रचनाकर्म पर आपको सादर बधाइयाँ.

शुभेच्छाएँ.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 9, 2014 at 9:08pm

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ..बधाई आपको प्रियंका  जी .

कृपया ध्यान दे...

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