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मेरे मन के गलियारे में

वो क्या है जो मेरे मन के गलियारे में
खिलखिलाती हुई
मंडराती हुई तितली सी
कभी टिमटिमाती
कभी ओझल हो जाती
वो रौशनी सी
जिसके करीब हँसते मुस्कुराते
जीवन एक नृत्य लगे
वो कोमल सी पंखुड़ी
हवा के साथ उड़ती
मेरे चहरे पे बरस पड़ी
सब ठहर गया
गर्म सांसों को
मंजिल मिल गयी 
सब भुज गया
हम जल उठे
मेरे मन के गलियारे में..

Views: 504

Comment

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Comment by Bhasker Agrawal on March 2, 2011 at 5:49pm

धन्यवाद वीरेंद्र जी

धन्यवाद अखिलेश्वर जी

 

Comment by Veerendra Jain on March 1, 2011 at 7:48pm
bahut hi badhiya rachna ...Bhaskar ji....bahut badhai aapko...
Comment by Akhileshwar Pandey on March 1, 2011 at 5:16pm
भास्कर भाई आपके ब्लॉग पर तो एक से एक कवितायें हैं. बहुत सुन्दर. आपकी लेखनी यूँ ही चलती रहे यही शुभकामना है मेरी. कहीं और भी लिखते हों तो जरुर बताएं.
Comment by Bhasker Agrawal on March 1, 2011 at 6:13am

रश्मी जी,गणेश जी,अरुण जी 

आप सभी को धन्यवाद :)

Comment by rashmi prabha on February 28, 2011 at 7:38pm
kafi gahre bhaw

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 28, 2011 at 7:26pm
भाष्कर जी , जलना भुजना शब्द का प्रयोग अच्छा लगा, कविता का प्रवाह बढ़िया है, बधाई इस अभिव्यक्ति पर |
Comment by Abhinav Arun on February 28, 2011 at 2:14pm

bahut khoob ,kya pravaah hai bhaavon ka -सब भुज गया
हम जल उठे
मेरे मन के गलियारे में..

badhaae bhaskar ji

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