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मैंने भी तेज नजरो को...

बन के अजनबी वो अक्सर मेरे दर से गुजरते हैं

फ़कत दीदार को खुद को रस्तों से जोड़ रक्खा हैं

दिल की दरियादिली दर्पण-सी सच्ची देखकर

घर के आईनों में तेरी तस्वीर को जोड़ रक्खा हैं

हकीकत की सतह से उस चाँद को देख रक्खा है..

खुदा के उस हसीं अजूबे से नाता जोड़ रक्खा है

कहने को तो उन्होने बहुत कुछ छोड़ रक्खा है...

चाहत की चिट्ठी को लिफाफों में मोड़ रक्खा है..

हवाओं के सहारे खुशबू कुछ इस तरफ़ आयी....

मैंने भी तेज नजरो को खुल्ला छोड़ रक्खा है..

.

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment

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Comment by Neeraj Neer on September 10, 2014 at 4:45pm

 सुन्दर !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 9, 2014 at 1:08pm

मित्र आनंद जी

बढ़िय गजल हुयी i एक मशविरा है i एक ही शेर के दोनों चरणों का अंत रक्खा है उचित नहीं है i नियम से गलत भी नही है i  पर इससे से शायर की शाब्दिक गरीबी झलकती है i आशा हैआप मेरा मतलब समझ गए होंगे i  उत्थानम भव i

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