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पछतावा (लघुकथा)

"भईया,  तुम ऐसा क्यों करते हो, अब तो मेरी सहेलियाँ भी कहती हैं कि तेरा भाई और उसके दोस्त बड़े गन्दे हैं, रास्ते में भद्दे-भद्दे कमेन्ट्स करते हैं"

सन्ध्या अपने भाई से नाराज होते हुए बोली! रोहन उसकी बात को अनसुना करके चला गया। शाम होते ही फिर वह और उसके दोस्त बस स्टाफ की तरफ निकलें, वहां  एक लड़की बस का इन्तजार कर रही थी, चेहरा दुपट्टे से ढका था, उसे देखते ही रोहन कमेन्ट्स करते हुए उसका दुपट्टा खींच लिया, देखा तो अवाक रह गया, जैसे पैरो तले से जमीन ही खिसक गई हो, सामने खड़ी सन्ध्या रो रही थी।

"मौलिक/अप्रकाशित" 

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Comment by Pawan Kumar on September 29, 2014 at 11:43am

आदरणीय विजय जी सादर अभिवादन! प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार!

Comment by Pawan Kumar on September 29, 2014 at 11:43am

आदरणीय खुर्शीद जी सादर अभिवादन! प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार!

Comment by vijay nikore on September 27, 2014 at 1:32pm

अति सुन्दर लघु कथा। बधाई।

Comment by khursheed khairadi on September 27, 2014 at 12:47pm

आदरणीय पवन कुमार जी बहुत ही प्रेरणास्पद लघुकथा है |हार्दिक अभिनन्दन 

Comment by Pawan Kumar on September 26, 2014 at 5:42pm

""आदरणीया रमेश कुमार चौहान जी  सादर अभिवादन! प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार! "

Comment by Pawan Kumar on September 26, 2014 at 5:41pm

"आदरणीय श्याम नरायन वर्मा जी, रचना पर आपने अमुल्य समय दिया इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद, हार्दिक आभार!"

Comment by Pawan Kumar on September 26, 2014 at 5:37pm

आदरणीय जितेन्द्र भईया सादर अभिवादन, लघुकथा अच्छी लगी इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद, सादर,  हार्दिक आभार! 

Comment by Pawan Kumar on September 26, 2014 at 5:29pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी सादर अभिवादन, रचना पर आपकी उपस्थिति से मनोबल बढ़ता है, स्नेह बनाये रखियेगा, हार्दिक आभार सादर!

Comment by रमेश कुमार चौहान on September 26, 2014 at 2:23pm

अच्छा संदेश है

Comment by Shyam Narain Verma on September 26, 2014 at 10:00am

सुंदर लघु कथा के लिए बधाई ......................

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