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ग़ज़ल --एक तू क्या मिला मैं ख़दा हो गया

212 212 212 212
----------------------------
इश्क़ मैंने किया दिलज़ला हो गया
उम्र भर के लिये मसख़रा हो गया

कुछ ग़लत फहमियाँ इस क़दर बढ़ गयीं
एक तू क्या मिला मैं ख़ुदा हो गया

चाँद भी सो गया रात तन्हा कटी 
लुट गयी महफ़िलें सब ये क्या हो गया

एक लौ दिख रही थी कहीं दूर फिर
देख़ते देख़ते रतज़गा हो गया

दर्द बढ़ता गया आँख बहती गयीं
आँसुओं का समन्दर ख़ड़ा हो गया

आसमाँ फट पडा जब ये उसने कहा
हाथ छोड़ो मेरा मैं बड़ा हो गया

एक पल में दगा दे गयी जिन्दगी
अगले पल ही वो मुझसे जुदा हो गया

इन्तिहाँ हो गयी फ़िर खुदा की क़सम
यार सचमुच मेरा बेव़फा हो गया

--------------------
उमेश कटारा
मौलिक एंव अप्राकशित




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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 9, 2014 at 2:48pm

आदरणीय उमेश जी ..इस ग़ज़ल को गुनगुनाने में तो आनंद आ गया ..भाव भी बहुत अच्छे हैं ..मेरी तरफ से हार्दिक बधाई सादर 

Comment by umesh katara on October 8, 2014 at 8:45pm

शुक्रिया विजय मिश्र जी

Comment by विजय मिश्र on October 8, 2014 at 3:10pm
सुंदर रचना , बधाई उमेशजी |

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