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चित्त की वृत्ति
चंचल है कदाचित,
यह मचलती
सूर्य के प्रकाश जैसी।


तन विषय विष से भरे
घट को पिए जो
खार के सागर
अहं के ज्वार उगले।


रोक दो वृत्ति
तमस को भेद कर -चित्त में
योग - अनुशासन
तुला पर तोलता है।


वृत्ति की आवृत्ति
निश्छल शून्य जब भी
दिव्य अद्भुत योग से
साक्षात मुक्ति।


आत्मा - परमात्मा
चित्त के उपज जो
एक खोली में रहें जीव जैसे-
काष्ठ में अग्नि,

जल में वाष्प संचय।


के0पी0सत्यम/मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by शिज्जु "शकूर" on October 9, 2014 at 10:14pm

बहुत सुन्दर आदरणीय केवल प्रसाद जी बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिये

Comment by Shyam Narain Verma on October 9, 2014 at 10:14am

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ... सादर बधाई

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 9, 2014 at 10:05am
चित्त की वृत्ति, तन विषय विष से भरे, रोक दो वृत्ति, योग - अनुशासन तुला पर तोलता है , सभी पंक्तियाँ बहुत सुन्दर औरअभिव्यक्ति में सफल.
बस एक अंतिम किंचित मैं समझ नहीं पा रहा हूँ , एक खोली में रहें जीव जैसे-काष्ठ में अग्नि . कुल मिला कर बहुत ही सार्थक , सुन्दर. बहुत बहुत बधाईयाँ आदरणीय केवल जी .
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 9, 2014 at 7:37am

सच ही कहा है आपने अपनी रचना में आदरणीय केवल जी. यह चित्त सदा ही चंचल होता है रौशनी की तरह, किन्तु सामयिक अंधेरों में संभलने का मौका भी नही देता है. बहुत ही सुंदर सार्थक चित्रण, बधाई स्वीकारें आदरणीय

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