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'माँ क्या दूल्हा बाजार में बिकता है? जिसे दहेज देकर खरीदने के लिए तू पेसे जोड़ रही है ।'
' मगर बेटा में तो तेरे लिए ...'
'माँ मुझे पति चाहिए कोई दहेज लेकर बिका हुआ खिलौना नही ।'


मोलिक व अप्रकाशित
किशन 21-10-14

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 3, 2014 at 10:47am

वाह वाह ! सुन्दर लघुकथा भाई किशन कुमार जी, बधाई स्वीकारें।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 22, 2014 at 12:18pm

वाह ! दहेज़ प्रथा पर गहरा प्रहार करती "गागर में सागर भर्ती" लघु कथा के लिए बधाई 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 21, 2014 at 11:01pm

सुंदर रचना, बधाई आदरणीय किशन जी

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