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अब नहीं करता मेरा मन ,
अपने घर  जाने को ,
 ना जाने क्यों ?
हालाँकि बदला कुछ खास नहीं है.
सिर्फ माता-पिता का साया उठा है ,
उस घर से , अलावा  सब वैसा ही  तो है,
भाई-भाभी, बच्चे , पडोसी सब.
पर  पता नहीं अब क्यों नहीं ,
लगता मन ,
सोचता हूँ क्या खास था तब ,
दौड़ा चला आता था मैं ,
बेवजह छुट्टियां लेकर ,
अब छुट्टी हो तब भी ,
नहीं करता मेरा मन ,
अपने घर  जाने को ,
ना जाने क्यों ?

अप्रकाशित -मौलिक

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 13, 2014 at 7:46pm

 इस भावविभोर करती सुन्दर अभिव्यक्ति पर हार्दिक बधाई , आदरणीय नवलकिशोर जी

Comment by Naval Kishor Soni on December 13, 2014 at 3:32pm
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 12, 2014 at 11:46am

आदरणीय भाई नवलकिशोर जी इस भावविभोर करती रचना के लिए हार्दिक बधाई । माता पिता में होता ही ऐसा आकर्षण है कि पांव बाहर नहीं टिकते उनके न होने पर खालीपन का अहसास होना स्वाभाविक है । उनकी कमी कोई पूरी नहीं कर सकता ।

Comment by Naval Kishor Soni on December 11, 2014 at 10:42pm

Respected शिज्जु "शकूर" Thanks for your blessing .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 11, 2014 at 9:51pm

आदरणीय नवल किशोर जी एक भावपूर्ण रचना है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Naval Kishor Soni on December 10, 2014 at 6:59pm

Respected Jitendra ji, Dr. vijay shankar ji, Meena ji, Shyam narain ji & Dr. Gopal narayan ji heartily thanks all of you for your blessing.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 10, 2014 at 11:08am

बहुत छोटी सी रचना, किन्तु प्रभाव बहुत गहरा छोडती हुई. और कहीं न कहीं सच भी तो यही है. बधाई स्वीकारें आदरणीय नवल जी

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 10, 2014 at 10:14am
आपकी यह छोटी सी कविता अच्छी लगी , कितनी ? इतनी कि इसे पढ़ कर मैंने घर पर ही एक कविता लिख दी " घर वो होता है " , इसी मंच पर।
आपकी रचना के लिए बहुत बहुत बधाई आदरणीय नवल किशोर सोनी जी।
Comment by Meena Pathak on December 9, 2014 at 8:04pm

भावपूर्ण अभिव्यक्ति ...बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on December 9, 2014 at 4:09pm

 सुन्दर अभिव्यक्ति पर हार्दिक बधाई।

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