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"लुटा हाट में नोट वोटें बटोरे",-

चुनावी समा बाँधना हो जभी वो,

गली में लुटाते रुपैया तभी वो|

लुटा हाट में नोट वोटें बटोरे,

यही वो घड़ी जो भुनाते चटोरे ||

 

बनायें-बिगाड़ें, सभी पे तुले वो,

इसारा मिले बर्तनें भी धुलें वो|

दिखे जो हुआ आपसे वोट लेना,

विजेता हुए तो, अधेला न देना ||

 

कभी ज्ञान की  ज्योंति जाया न होगी,

बली पुष्ट होते निरा मूढ़-रोगी |

मिटाये अँधेरा डगोँ को बढ़ाए,

यही ज्योंति प्रेरा शिखा पे चढ़ाए….

*******************************

शरद सिंह ‘विनोद’

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by SHARAD SINGH "VINOD" on December 23, 2014 at 4:33pm

आदरणीय श्री "शकूर" जी प्रेरणा हेतु धन्यवाद..........

Comment by SHARAD SINGH "VINOD" on December 23, 2014 at 4:27pm

"जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचते कवि" बहुत खूब सोमेश जी धन्यवाद....छन्दोत्सव हेतु ही यह रचना थी|

Comment by SHARAD SINGH "VINOD" on December 23, 2014 at 4:15pm

आदरणीय श्री 'भंडारी' जी विश्लेषणात्मक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद !

Comment by SHARAD SINGH "VINOD" on December 23, 2014 at 2:11pm

आदरणीय योगेन्द्र जी इस रचना को गहराई से पढ़ने के लिये सहृदय धन्यवाद!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 23, 2014 at 8:34am

आदरणीय बढिया प्रस्तुति के लिये बधाइयाँ ।

प्रथम पंक्ति --  चुनावी समा बाँधना हो जभी वो   -- व्याकरण सम्मत नही लग रही है

शायद ये ठीक रहे -- चुनावी समा बाँधते हैं जभी वो -- सोच के देखियेगा ।

Comment by somesh kumar on December 22, 2014 at 11:28pm

अच्छी रचना ,छ्न्दोत्स्व में दिए ज्ञ चित्र पर आधारित लगती है ,पर भाव और लय प्रभावशाली हैं ,बधाई |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 22, 2014 at 8:22pm

अच्छी रचना है आदरणीय 'विनोद' जी सादर बधाई

Comment by SHARAD SINGH "VINOD" on December 22, 2014 at 6:40pm

आदरणीय 'वामनकर' जी सकारात्मक टिप्पणी के लिये धन्यवाद....श्रेष्ठ्जनो का आशिर्वाद.........आप जैसे विश्लेषक की हम अनुज अनुचरों को जरूरत है|

Comment by SHARAD SINGH "VINOD" on December 22, 2014 at 6:17pm

आदरणीय हरि प्रसाद दुबे जी बधाई व उत्साह वर्धन के लिये धन्यवाद

Comment by Hari Prakash Dubey on December 22, 2014 at 1:20pm

आदरणीय शरद सिंह जी  इस सुन्दर रचना पर बधाई स्वीकार करें !

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