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हर जगह हर घडी बस तू साथ है
जहाँ मेरी नज़रे पडी बस तू साथ है
छोड़ा वक़्त ने जहाँ मुझ बदनसीब को
वहां पे मिली खड़ी बस तू साथ है


मेरे नये संसार में बस तू साथ है
प्यार के व्यवहार में बस तू साथ है
बदल गये जिसमें मेरे सब चाहने वाले
उस वक़्त के रफ़्तार में बस तू साथ है


मोहब्बत के इस कर्ज़ में बस तू साथ है
इंसानियत के फ़र्ज़ में बस तू साथ है
यूँ तो खुशियों के हमदर्द सब हैं मगर
मुझे मिले हर दर्द में बस तू साथ है


सावन का असर है जब तू साथ है
यौवन भी अजर है जब तू साथ है
ज़िन्दगी की मेरी कमाई हो तुम
मौत का भी क्या डर है जब तू साथ है ||

***************************************

"मौलिक व अप्रकाशित "

Views: 469

Comment

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Comment by ram shiromani pathak on December 28, 2014 at 3:12pm
सुन्दर प्रस्तुति बंधू।
Comment by maharshi tripathi on December 27, 2014 at 6:24pm

मिथिलेश जी , आपके सलाह के लिए धन्यवाद,,,आगे से रचना के समय ध्यान रखूँगा |

 

Comment by Shyam Narain Verma on December 27, 2014 at 2:33pm

बहुत  ही सुन्दर प्रस्तुति  //हार्दिक बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 26, 2014 at 10:12pm

आदरणीय महर्षि  भाई जी एक ही रचना दो बार क्यों पोस्ट कर रहे है -

1- http://www.openbooksonline.com/profiles/blogs/5170231:BlogPost:598343

2- http://www.openbooksonline.com/profiles/blogs/5170231:BlogPost:598580

Comment by Hari Prakash Dubey on December 26, 2014 at 5:22pm

महर्षि जी बढ़िया प्रयास ! 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 26, 2014 at 11:48am

महर्षि जी

वामनकर जी के कथन पर गौर करेंगे तो बहुत बेहतर लिख पाएंगे i सस्नेह ii


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 26, 2014 at 2:15am

अच्छी भावाभियक्ति ... अच्छा प्रयास 

रचना का छंद या बहर अवश्य लिखे ..... पाठकों की परीक्षा न लें .... 

रचना को मात्राओं में इस तरह भी कहा जा सकता है-

2 1 2 2 - - 2 1 2 2 - - 2 1 2 2

हर जगह पे,  हर घडी बस, साथ है तू 
जब जहाँ  नज़रे पडी बस, साथ है तू
वक़्त ने छोड़ा मुझे  ये  बदनसीबी 
पर मिली जब तू खड़ी बस, साथ है तू 

इस नये संसार में बस साथ है तू 
प्यार के व्यवहार में बस  साथ है तू 
चाहने वाले बदल जाए नहीं गम 
इस वक़्त के रफ़्तार में बस साथ है तू 

कृपया ध्यान दे...

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