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गजल- मुझे शायरी में पुकार दे!

११२ १२ ११२ १२

तु गजल में थोडा खुमार दे!
तु जरा सा और सँवार दे!!

तेरे लफ्ज तेरी जमीन है!
इन्हें आँसुओं से निखार दे!!

उसे भूल जा है जो बेवफा!
ये लिबास गम का उतार दे!!

यूं घुमा फिरा के न बात कर!
मुझे साफ साफ नकार दे!!

मैं बिगड गया मुझे डाँट माँ!
मेरी जिन्दगी को सुधार दे!!

या खुदा तु कह दे घटाओं से!
मेरे खेत को भी दुलार दे!!

कि मैं दफ्न हूँ मेरे शे'र में!
मुझे शायरी में पुकार दे!!


मौलिक व अप्रकाशित!

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 13, 2015 at 7:38pm
अच्छी ग़ज़ल बधाई। बाकि गुणीजनों की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करें।
Comment by Rahul Dangi Panchal on January 13, 2015 at 5:41pm
आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी बहुत बहुत शुक्रिया! परन्तु मुझे मेरी कमीयों से भी अवगत करा दिया करे सादर विनती!
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 13, 2015 at 5:35pm

बही बढ़िया i दागी जी i ऐसे ही कहते रहे i

Comment by Rahul Dangi Panchal on January 13, 2015 at 3:37pm
आदरणीय एडमिन जी रचना को स्वीक्रती देने हेतु बहुत बहुत धन्यवाद!

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