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ग़ज़ल--बिना क़श्ती के निकला हूँ ,समन्दर पार करने को

नहीं राजी हुआ कोई ,मेरा किरदार करने को
बिना क़श्ती के निकला हूँ ,समन्दर पार करने को
..
कोई सोये कहीं भूख़ा ,ज़लाये मुल्क़ भी कोई
इन्हें बस वोट लेने हैं, मज़े  सरक़ार करने को
..
कोई मौजूद था मेरा ,मेरे दुश्मन की महफ़िल में
रची साजि़श उसी ने थी, मुझे गद्दार करने को
..
तुम्हारे इक इशारे पर , मेरी ये ज़ान जानीं है
मग़र ज़िन्दा जो रक़्खा हैं,गुनाह स्वीकार करने को
..
चली आयी तसव्वुर में , तेरी तस्वीर धुँधली सी
मेरी ये जान बाक़ी है ,फ़क़त दीदार करने को

मौलिक व अप्रकाशित
उमेश कटारा

Views: 719

Comment

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Comment by umesh katara on January 16, 2015 at 7:44pm
Comment by Madan Mohan saxena on January 16, 2015 at 3:41pm

वाह , बहुत खूब ग़ज़ल कही है बधाई
अब जिनकी बेबफ़ाई के चर्चे हैं हर तरफ
बह पहले बफादार थे ये कल की बात है

जिसने लगायी आग मेरे घर में आकर के
बह शख्श मेरा यार था ये कल की बात है


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 15, 2015 at 10:47pm

आदरणीय उमेश कटारा भाई , बढ़िया गज़ल कही है , मतला बहुत खूब सूरत है , आपको हार्दिक बधाई ।

आ. उमेश भाई --  गुनाह स्वीकार करने को   --- ये मिसरा बे बहर हो गया है , देख लीजियेगा ।

Comment by umesh katara on January 15, 2015 at 9:31pm

मिथिलेश वामनकर जी आपको ग़ज़ल पसन्द आई आपका तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ

Comment by umesh katara on January 15, 2015 at 9:31pm

Hari Prakash Dubey जी आपको ग़ज़ल पसन्द आई आपका तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 15, 2015 at 8:29pm

आदरणीय उमेश कटारा जी बहुत अच्छी गजल हुई है..... बेहतरीन अशआर है ....शेर दर शेर दाद कुबूल कीजिये 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 15, 2015 at 8:00pm

आदरणीय उमेश कटारा जी , सुन्दर रचना ...... नहीं राजी हुआ कोई ,मेरा किरदार करने को

बिना क़श्ती के निकला हूँ ,समन्दर पार करने को...... हार्दिक बधाई स्वीकार करें !     

..

Comment by umesh katara on January 15, 2015 at 7:14pm

pratibha tripathi जी आपको ग़ज़ल पसन्द आई आपका तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ

कृपया ध्यान दे...

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