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मुझे मार कर क़्यों ज़लाया नहीं है

तेरा कुछ भी मुझ पर बक़ाया नहीं है
मुझे मार कर क़्यों ज़लाया नहीं है
..
सज़ा बे-बज़ह ही मिली है क़सम से
क़िसी को भी मैंने सताया नहीं है
..
गया तू नज़र से,मेरी ज़ान लेक़र 
मग़र जहर क्यों कर पिलाया नहीं है
..
मोहब्बत में कर दूँ ज़रा भी मिलावट
व़फा ने ये मुझको सिख़ाया नहीं है
..
मुझे कह रही हैं मुसलसल ये हिचकी
अभी तक भी तूने भुलाया नहीं है

मौलिक व अप्रकाशित
उमेश कटारा

Views: 720

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Comment by umesh katara on January 15, 2015 at 8:11am
Comment by umesh katara on January 15, 2015 at 8:11am

JAWAHAR LAL SINGH जी हार्दिक शुक्रिया

Comment by Shishir Dwivedi on January 14, 2015 at 11:44pm
वाह क्या बात है बहुत खूब कही आप ने
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on January 14, 2015 at 7:45pm

बढ़िया है, बधाई!

Comment by umesh katara on January 14, 2015 at 6:47pm

khursheed khairadi जी हार्दिक शुक्रिया

Comment by umesh katara on January 14, 2015 at 6:47pm

asha pandey ojha जी शुक्रिया

Comment by asha pandey ojha on January 14, 2015 at 4:46pm

आदरणीय उमेश जी  बहुत उम्दा ग़ज़ल 

Comment by khursheed khairadi on January 14, 2015 at 11:39am

मुझे कह रही हैं मुसलसल ये हिचकी
अभी तक भी तूने भुलाया नहीं है

आदरणीय उमेश जी उम्दा ग़ज़ल हुई है |सादर अभिनन्दन |

Comment by umesh katara on January 14, 2015 at 7:57am

pratibha tripathi  जी हार्दिक शुक्रिया

Comment by umesh katara on January 14, 2015 at 7:57am

laxman dhami  जी हार्दिक शुक्रिया

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