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ग़ज़ल--बिना क़श्ती के निकला हूँ ,समन्दर पार करने को

नहीं राजी हुआ कोई ,मेरा किरदार करने को
बिना क़श्ती के निकला हूँ ,समन्दर पार करने को
..
कोई सोये कहीं भूख़ा ,ज़लाये मुल्क़ भी कोई
इन्हें बस वोट लेने हैं, मज़े  सरक़ार करने को
..
कोई मौजूद था मेरा ,मेरे दुश्मन की महफ़िल में
रची साजि़श उसी ने थी, मुझे गद्दार करने को
..
तुम्हारे इक इशारे पर , मेरी ये ज़ान जानीं है
मग़र ज़िन्दा जो रक़्खा हैं,गुनाह स्वीकार करने को
..
चली आयी तसव्वुर में , तेरी तस्वीर धुँधली सी
मेरी ये जान बाक़ी है ,फ़क़त दीदार करने को

मौलिक व अप्रकाशित
उमेश कटारा

Views: 715

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Comment by umesh katara on January 18, 2015 at 7:55pm
Comment by Dr. Vijai Shanker on January 18, 2015 at 7:20pm
सुन्दर ग़ज़ल, बधाई आदरणीय उमेश ककतारा जी, सादर.
Comment by umesh katara on January 18, 2015 at 7:16pm

Rahul Dangi जी इसका जबाब तो आदरणीय सुधीजन गिरिराज जी या भाई ही दे सकते हैं मेरा ज्ञान इतना विस्तृत नहीं है 
 आपको ग़ज़ल पसन्द आई आपका तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ

Comment by umesh katara on January 18, 2015 at 7:14pm
Comment by Rahul Dangi Panchal on January 18, 2015 at 2:01pm
आदरणीयों मैं गजल कुछ देर में खोज कर पेश करूंगा! मैने दवा , दुआ आदि के साथ जगह को काफिया में देखा! क्या वहाँ काफिया में जगह को जगा लिख सकते? क्रपया सुझाव दे!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 18, 2015 at 9:40am

आदरणीय उमेश भाई , ये मेरे लिये एक नई जानकारी है , मै अपनी सलाह वापस लेता हूँ , और आपको एक  नई जानकारी सझा करने  के लिये दिली धन्यवाद देता हूँ ।

Comment by umesh katara on January 18, 2015 at 8:18am

गिरिराज भंडारी जी मैंने गुनाह को 12 ही लिया है सर  गुनाह लिखना जरूरी है
और गुना पढ़ा है  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 18, 2015 at 8:04am
आदरणीय उमेश भाई , गुनाह का वज़्न - 121 होना चाहिये , मेरा ऐसा खयाल है ।
गुनाह स्वीका/ र करने को
12122 1 222 -- अगर सही लगे तो आप - गलत स्वीकार करने को -- कह सकते हैं ।
Comment by umesh katara on January 17, 2015 at 6:39pm
Comment by Rahul Dangi Panchal on January 17, 2015 at 11:28am
नहीं राजी हुआ कोई ,मेरा किरदार करने को
बिना क़श्ती के निकला हूँ ,समन्दर पार करने को

वाह क्या बात है जनाब! सुन्दर!

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