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ग़ज़ल----उमेश कटारा

1222   1222   1222   1222

डसेगी मुझको तनहाई ,कटेगा ये सफ़र कैसे
तेरा घर है मेरे दिल में, जलाऊँगा वो घर कैसे

किसी को भूल जाना भी नहीं होता क़भी आसां
तू कहता है भुलादूँ मैं ,बता तू ही मगर कैसै

मेरी इन सुर्ख आँखों में लहू ये क्यों उतर आया
मुहब्बत में लगा दिख़ने बगाव़त का असर कैसे

चला है बेव़फा होकर बसाने घर रक़ीबों का
किसी दिन लौट भी आया ,मिलायेगा नज़र कैसे

बहाता हूँ दो आँसू मैं,मेरी तनहाई के संग संग
मज़ा-ए- इश्क़ में देखो किया मैंने बसर कैसे

-----------उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित
 

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Comment

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Comment by Madan Mohan saxena on January 16, 2015 at 3:46pm

वाह , बहुत खूब

किसी को भूल जाना भी नहीं होता क़भी आसां
तू कहता है भुलादूँ मैं ,बता तू ही मगर कैसै


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 8, 2015 at 7:13pm

आदरणीय उमेश भाई , आ. बागी जी भी वही कह रहे हैं जो मै कह रहा हूँ , संग सही शब्द है  जिसकी मात्रा  21 है , उसे सँग लिख के  (2 मात्रा)  मान लेना उचित नही है , ये मेरा ख़याल है , अतः मेरे हिसाब से संग 21 मानकर मिसरे मे सुधार कर लेना सही होगा , या संग शब्द को हटा कर कुछ और कहना । जैसे -- लिपट तनहाइयों से मैं बहाता हूँ सदा आँसू  ( अगर सही लगे तो ? )

Comment by umesh katara on January 8, 2015 at 6:39pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी मैंने सँग सँग ही लिखा था पर आदरणीयEr. Ganesh Jee "Bagi" ने संग संग लिखने को कहा तो मैंने संग संग किया है
मैं तो आप दोनों ही को अपना गुरु मानता हूँ कृपया आप दोनों उचित मार्गदर्शन करें
और बतायें में क्या करूँ
सँग सँग जो मैंने पूर्व में लिखा था 
Er. Ganesh Jee "Bagi"के कहे अनुसार

Comment by somesh kumar on January 8, 2015 at 4:51pm

डसेगी मुझको तनहाई ,कटेगा ये सफ़र कैसे
तेरा घर है मेरे दिल में, जलाऊँगा वो घर कैसे

पहला ही शे'र दिल को तरंगित कर गया ,गज़ल भी अर्थपूर्ण हैं ,बाकी सुधार तो गुणीजन ने बता ही दिए हैं 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 8, 2015 at 1:25pm

आदरणीय उमेश भाई , बहुत सुन्दर गज़ल कही है , वाह !

मेरी इन सुर्ख आँखों में लहू ये क्यों उतर आया
मुहब्बत में लगा दिख़ने बगाव़त का असर कैसे

चला है बेव़फा होकर बसाने घर रक़ीबों का
किसी दिन लौट भी आया ,मिलायेगा नज़र कैसे  - बहुत सुन्दर आदरणीय , हार्दिक बधाइयाँ ।

बहाता हूँ दो आँसू मैं,मेरी तनहाई के संग संग   - अंतिम शे र का ये मिसरा बे बहर है

संग का क़ज़न आपको 21 लेना चाहिये , जैसे रंग का लिया जाता है , वर्तनी मे अगर चंद्र बिंन्दु हो . जैसे-  सँवर  तो मात्रा 12 लिया  जाता है , ।

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 7, 2015 at 7:27pm

वाह भाई ग़ज़ल अच्छी लगी बधाई

Comment by Hari Prakash Dubey on January 7, 2015 at 5:37pm

बहाता हूँ दो आँसू मैं,मेरी तनहाई के सँग सँग
मज़ा-ए- इश्क़ में देखो किया मैंने बसर कैसे........आदरणीय  उमेश कटारा जी बहुत खूब, शानदार ! हार्दिक बधाई आपको !

Comment by Anurag Prateek on January 7, 2015 at 3:36pm

मेरी इन सुर्ख आँखों में लहू ये क्यों उतर आया

मुहब्बत में लगा दिख़ने व़गाबत का असर कैसे -- achha laga


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 7, 2015 at 1:28pm

//किसी को भूल जाना भी नहीं होता क़भी आसाँ आसां
तू कहता है भुलादूँ मैं, बता तू ही मगर कैसै

मेरी इन सुर्ख आँखों में लहू ये क्यों उतर आया
मुहब्बत में लगा दिख़ने व़गाबत बगावत का असर कैसे

बहाता हूँ दो आँसू मैं,मेरी तनहाई के सँग सँग संग संग
मज़ा-ए- इश्क़ में देखो किया मैंने बसर कैसे//
अच्छी ग़ज़ल प्रस्तुत हुई है, बधाई कटारा साहब.

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