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ग़ज़ल :- ऐ खुदा क्योंकर तेरे सागर में सुनामी हुई

ग़ज़ल :- ऐ खुदा क्योंकर तेरे सागर में सुनामी हुई

आपदा की हद हज़ारों ज़िंदगी पानी हुई ,

ऐ खुदा क्योंकर तेरे सागर में सुनामी हुई |

 

है नहीं कूवत लखन सी दौर के इंसान में ,

भय नहीं है राम सा जो ऐसी मनमानी हुई |

 

खूबसूरत तट थे अब शमशान में तब्दील हैं ,

मौत भी लगने लगी है जानी पहचानी हुई |

 

ज्ञान का हथियार ले मानव प्रकृति से युद्धरत ,

क्यों  प्रकृति के वार से फिर उसको हैरानी हुई |

 

किसने सागर को मथा निकला कहाँ अमृत कलश ,

चाल दैत्यों की थी या देवों से नादानी हुई |

 

(@ अभिनव अरुण  # ०४-०१-२००५)

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Comment by Abhinav Arun on March 16, 2011 at 8:18am

आभार बागी भाई !


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 14, 2011 at 11:36pm

ज्ञान का हथियार ले मानव प्रकृति से युद्धरत ,

क्यों  प्रकृति के वार से फिर उसको हैरानी हुई |

 

बेहद खुबसूरत कहन अरुण भाई , अच्छी ग़ज़ल बन पड़ी है, कल भी यह सार्थक थी और आज भी सार्थक है , बहुत बहुत बधाई |

Comment by Abhinav Arun on March 14, 2011 at 8:30am
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