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फिर हुआ सागर-मंथन

नए कल्प में

इस बार रत्न निकले तेरह   

देवता व्यग्र ! विष्णु हैरान !

कहाँ गया अमृत-घट ?

 

समुद्र ने कहा

अब वह जल कहाँ

जिसमे होता था अमृत

जिसे मेरी गोद में

डालती थी गंगा

जिससे भरता था घट

 

अब तो शिव ने भी

दो टूक कह दिया है 

नहीं करेंगे वे शिरोधार्य

गंगा को

अलबत्ता पियेंगे उसके उदक को

और धारण करेंगे

उसे निज कंठ में

हलाहल की भांति ---उफ़ --!

 

 (मौलिक व् अप्रकाशित )

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 28, 2015 at 12:22pm

आ० विजय सर !

आपका कथन सही है i अब अमृत मिल भी जाये तो असुर ही उसका पान करेंगे  i आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया का आभारी हूँ i  सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 28, 2015 at 12:21pm

आ० हरि प्रकाश जी

आपका स्नेह सदैव मिलता है i आपकी तीप से सतत लेखन की प्रेरणा मिलती है i सादर i

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 28, 2015 at 12:18pm

आ 0 कृष्णा मिश्र 'जान '

आपकी प्रतिक्रिया से ही आपकी प्रतिभा का परिचय मिल रहा है i आपका आभार  i सस्नेह i

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 28, 2015 at 10:46am
आदरणीय डॉo गोपाल नारायण जी, कलयुग में क्या होगा अमृत के मिलने से , कब्जा जिनका होगा उम्र भी उन्हीं की बढ़ेगी, भले लोगों को न अमृत मिलेगा न अनंत उम्र , इसलिए अमृत का न होना ही सार्थक है। प्रदूषण को चित्रित करती आपकी रचना को प्रणाम , आपको बधाई, सादर।
Comment by Hari Prakash Dubey on February 28, 2015 at 10:08am

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर बहुत सुन्दर 

अब तो शिव ने भी

दो टूक कह दिया है 

नहीं करेंगे वे शिरोधार्य

गंगा को

अलबत्ता पियेंगे उसके उदक को

और धारण करेंगे

उसे निज कंठ में

हलाहल की भांति ---उफ़ --!.........इस रचना और अद्भुत कल्पना पर बधाई आपको ! सादर 

 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 28, 2015 at 9:40am

वाह! आदरणीय...!क्या आपकी कल्पना का समुद्र है...जिसमे से यह 'सागर मंथन' रुपी अमृत बहार आया है....बिल्कुल सही वर्णन किया है,,आपने आज की गंगा की दयनीय स्थिति का..मै हैरान हूँ  आपके अंदर का इतना युवा सोच का रचनाकार देखकर..जो प्रदूषण के मुद्दे को इस तरह उत्तम भाव से उठा रहा है..नए लेखकों को आपसे सीख़ लेनी चाहिए कि समाज और सामाजिक सरोकारों से कैसे जुड़े...इश्क़-मुहबब्त रोजी-रोटी का दर्द तो कोई भी कह लेता है..पूरे मानवसमाज से जुड़ने वाले कम ही होते है..आपकी उर्जा को प्रणाम..बार बार वंदन आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी!!

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