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ग़ज़ल : एक वो थी एक मैं था एक दुनिया जादुई

बह्र : २१२२ २१२२ २१२२ २१२

रूह को सब चाहते हैं जिस्म दफ़नाने के बाद
दास्तान-ए-इश्क़ बिकती खूब दीवाने के बाद

शर्बत-ए-आतिश पिला दे कोई जल जाने के बाद
यूँ कयामत ढा रहे वो गर्मियाँ आने के बाद

कुछ दिनों से है बड़ा नाराज़ मेरा हमसफ़र

अब कोई गुलशन यकीनन होगा वीराने के बाद


जब वो जूड़ा खोलते हैं वक्त जाता है ठहर
फिर से चलता जुल्फ़ के साये में सुस्ताने के बाद

एक वो थी एक मैं था एक दुनिया जादुई
और क्या कहने को रहता है इस अफ़साने के बाद
----
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 917

Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 23, 2015 at 11:48am
बहुत बहुत धन्यवाद आ. प्रतिभा जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 23, 2015 at 11:48am
बहुत बहुत शुक्रिया आ. आशुतोष मिश्र जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 23, 2015 at 11:46am
आ. निधि अग्रवाल जी, इस बह्र में अंत के दीर्घ के बाद एक लघु लेने की छूट होती है। बहुत बहुत शुक्रिया
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 23, 2015 at 11:44am
तह-द-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आ. गिरिराज जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 23, 2015 at 11:43am
बहुत बहुत शुक्रिया आ. दिनेश कुमार जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 23, 2015 at 11:43am
बहुत बहुत शुक्रिया आ. श्याम नारायण वर्मा जी
Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 20, 2015 at 5:34pm

आदरणीय धर्मेन्द्र जी ..कमल की ग़ज़ल ..बिलकुल ताजगी से भरी ..हर शेर उम्दा ..

कुछ दिनों से है बड़ा नाराज़ मेरा हमसफ़र

अब कोई गुलशन यकीनन होगा वीराने के बाद


जब वो जूड़ा खोलते हैं वक्त जाता है ठहर
फिर से चलता जुल्फ़ के साये में सुस्ताने के बाद..इन शेरो ने मुझे बहुत प्रभावित् किया ..ढेर सारी बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by Nidhi Agrawal on March 20, 2015 at 4:07pm

कुछ दिनों से है बड़ा नाराज़ मेरा हमसफ़र

अब कोई गुलशन यकीनन होगा वीराने के बाद

यह शेर बहुत ख़ास है वैसे "के बाद" २१२ कैसे हुआ समझ में नहीं आया 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 19, 2015 at 6:27pm

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , पूरी गज़ल लाजवाब कही है , दिली बधाइयाँ स्वीकार करें । ये शेर बहुत ख़ास लगा भाई जी --

एक वो थी एक मैं था एक दुनिया जादुई
और क्या कहने को रहता है इस अफ़साने के बाद  -- बहुत बधाई आपको ॥

Comment by दिनेश कुमार on March 19, 2015 at 4:53pm
बहुत खूब।वाह वाह वाह। हर एक शेर उम्दा। मतला लाजवाब। हार्दिक शुभकामनाएं।भाई धर्मेंद्र जी।

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