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चलते चलते ……

1.

एक कतरा
देर तक
बहते बहते
कपोल पर ही सो गया
शायद
अभी इंतज़ार बाकी था

2.

ये अलस्सुब्ह
किसकी नमी को छूकर
बादे सबा आई है
खुली पलक का
कोई ख़्वाब
सिसकता रह गया शायद

3.

तेरे हर वादे पे
यकीं करता रहा
पर तुझे यकीं न आया
मैं हर लम्हा तुझपे
सौ सौ बार मरता रहा
मेरी मौत को भी तूने
मेरी नींद समझा
नज़र भर के भी तूने
न देखा मुझको
गो चहरे से कफ़न
बार बार हटता रहा

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 731

Comment

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Comment by Sushil Sarna on March 26, 2015 at 12:02pm

आदरणीय   Hari Prakash Dubey जी रचना पर आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on March 26, 2015 at 12:01pm

आदरणीय    Dr Ashutosh Mishra जी रचना पर आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Hari Prakash Dubey on March 26, 2015 at 9:17am

आदरणीय सुशील सरना जी , रचना पर आपको हार्दिक बधाई ! सादर

एक कतरा

देर तक

बहते बहते

कपोल पर ही सो गया

शायद

अभी इंतज़ार बाकी था......वाह 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 25, 2015 at 3:54pm

आदरणीय सुशील जी ..इस शानदार रचना के लिए हार्दिक बधाई saadar

नज़र भर के भी तूने 
न देखा मुझको 
गो चहरे से कफ़न 
बार बार हटता रहा..बहुत बढ़िया 

Comment by Sushil Sarna on March 24, 2015 at 9:16pm

आदरणीय   Shyam Mathpal जी रचना पर आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on March 24, 2015 at 7:25pm

आदरणीय सबीर कबीर साहिब रचना को आपने सराहा ,आपका हार्दिक आभार।  आपके द्वारा इंगित त्रुटि पर मेरे ध्यानाकर्षण के लिए तहे दिल से शुक्रिया ,मैं शीघ्र ही इसे संशोधित कर लूँगा। पुनः आपका हार्दिक हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on March 24, 2015 at 7:21pm

आदरणीय   Shyam Mathpal     जी रचना पर आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on March 24, 2015 at 7:21pm

आदरणीय    savitamishra    जी रचना पर आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on March 24, 2015 at 7:20pm

आदरणीय    vijay nikore    जी रचना पर आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on March 24, 2015 at 7:20pm

आदरणीय   Shyam Narain Verma   जी रचना पर आत्मीय प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

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