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ग़ज़ल :- तिरा दिल है कि पत्थर हँस रहा है

तिरा दिल है कि पत्थर हँस रहा है
ख़ुद अपना घर जलाकर हँस रहा है

बड़े लोगों की बातें भी बड़ी हैं
लगा,जैसे समन्दर हँस रहा है

सलीक़ा मन्द रो देते हैं जिस पर
तू ऐसी बात सुन कर हँस रहा है

बुराई का बुरा अंजाम होगा
फ़क़ीरों पर तुअंगर हँस रहा है

नहीं है ख़ुश कोई आबाद होकर
कोई बर्बाद होकर हँस रहा है

समझ लेना क़यामत आ गई है
अगर देखो,सुख़न्वर हँस रहा है

मिरी बर्बादियों पर ख़ुश है इतना
वो दिल पर हाथ रखकर हँस रहा है

विदाई हो गई बेटी की शायद
तभी मज़दूर खुलकर हँस रहा है

इसी दिन की दुआऐं माँगता था
मिरी क़ीमत लगाकर हँस रहा है

कभी "मारूफ़" को हँसता जो देखूँ
लगे,माह-ए-मुनव्वर हँस रहा है

"समर",ग़ैरत दिलाओ फ़ौजियों को
उधर दुश्मन का लश्कर हँस रहा है

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on April 8, 2015 at 10:55am
जनाब शिज्जु "शकूर" जी,आदाब,हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Samar kabeer on April 8, 2015 at 10:52am
जनाब वीनस केसरी जी,आदाब,मेरी ग़ज़लें और कमेंट मेरा बेटा टाईप करता है,टाईपिंग के वक़्त मैं उसे ज़बानी बताता रहता हूँ कि कौन सा शब्द किस तरह टाईप करना है,आप महसूस करेंगे तो समझ लेंगे कि ये मेरे लिये कितना दुश्वार होता होगा और इसमें कितना एक्स्ट्रा समय लगता है |
जनाब सौरभ पाँडे जी ने बताया कि आप अरूज़ और ज़िहाफ़ पर पिछले चार पाँच वर्षों से काम कर रहे हैं,मैं यह जानने के लिये उत्सुक हूँ कि आप अरूज़ के किन बिन्दुओं पर काम कर रहे हैं,ज़िहाफ़ के बारे में तो मैं जानता हूँ कि बह्रों के अरकान के तग़य्युर को ज़िहाफ़ कहते हैं,कृपया मुझे ज़रूर बताऐं क्यूँकि इस संबंध में कुछ तिश्ना सवालात हैं जिनके जवाब अभी तक नहीं मिल सके हैं,मेरे नज़दीक इन चार पाँच वर्षों में आप बहुत कुछ काम कर चुके होंगे,कहते हैं इल्म(ज्ञान) बाँटने से बड़ता है तो क्यूँ न हम एक दूसरे के ज्ञान को शेयर करें,अगर आप इस के लिये तय्यार हैं तो मुझे बताऐं ताकि मैं अपने अगले कमेंट में आपके समक्ष कुछ सवालात रख सकूँ,आम तौर पर यह देखा गया है कि जो शाईर अरूज़ के माहिर होते हैं उनकी ग़ज़लें इतनी अच्छी नहीं होतीं,उनमें एक अजीब सा फीका पन रहता है,एक शाईर के लिये अरूज़ का ईल्म सीखना आवश्यक तो है लेकिन इसमे डूब जाने से शाईरी से हाथ धोना पड़ते हैं,आपके जवाब की प्रतीक्षा में |

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Comment by शिज्जु "शकूर" on April 8, 2015 at 10:20am

वाह बेहद खूूबसूरत ग़ज़ल है हर शेर के लिये दिली दाद कुबूल फरमायें

Comment by वीनस केसरी on April 7, 2015 at 10:57pm

तुअंगर शब्द मुझे अर्थहीन लगा और काफिया रदीफ़ की और ध्यान ही न गया ..
स्वीकार करता हूँ निश्चित ही मेरा कमेन्ट जल्दीबाजी में हुआ है ..

मुझे लगा आप स्वयं टाईप नहीं करते और जो कोई टाईप करता होगा ज़रूरी नहीं कि उसे बहर का ज्ञान हो... इसलिए टाईपिंग मिस्टेक के आलावा और कुछ सूझा ही नहीं ...

तुअंगर शब्द का अर्थ ग़ज़ल के साथ लिख दें तो अन्य पाठकों को आसानी होगी ..

सादर

Comment by Samar kabeer on April 7, 2015 at 10:54pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी,आदाब,विद्वानों की शिर्कत ग़ज़ल में चार चाँद लगा देती है,सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Samar kabeer on April 7, 2015 at 10:49pm
जनाब वीनस केसरी जी,आदाब,आपका हुक्म सर आँखो पर,लेकिन जनाब यह टाईपिंग मिस्टेक नहीं है,आपने कमेंट शायद जल्दबाज़ी में कर दिया,"तुअंगर" फ़ारसी भाषा का शब्द है,इसका अर्थ होता है अमीर,दौलतमंद,मालदार|
ये मेरी ग़ज़ल का क़ाफ़िया है आपने लिखा है ऐसा कर लूँ :-
"फ़क़ीरों पर अगर तू हँस रहा है"

तो जनाब ज़रा ग़ौर तो कीजिये इस तरह तो क़ाफ़िया ही बदल जाता है,ग़ज़ल में शिर्कत के लिये और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Samar kabeer on April 7, 2015 at 10:36pm
आली जनाब डा.विजय शंकर जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Samar kabeer on April 7, 2015 at 10:34pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी,आदाब,आप ख़ुद अच्छी ग़ज़ल कहते हैं, ग़ज़ल में आपकी शिर्कत से ही दिल बाग़ बाग़ हो जाता है,सुख़न नवाज़ी के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |
Comment by Samar kabeer on April 7, 2015 at 10:29pm
जनाब "जान" गोरखपुरी साहिब,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत के लिये और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रिया |
Comment by Samar kabeer on April 7, 2015 at 10:27pm
जनाब श्याम नारायण वर्मा जी,आदाब,ज़र्रा नवाज़ी के लिये तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ |

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