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ग़ज़ल -- मुसीबत में ही याद आते हैं राम

122-122-122-121

ये महँगाई जो बढ़ रही बेलगाम
हमारा तो जीना हुआ है हराम

तिज़ारत में हासिल महारत जिसे
उसे गुठलियों के भी मिलते हैं दाम

न जाने सभी की ये फितरत है क्यूँ
मुसीबत में ही याद आते हैं राम

रखे जो सदा हौसला और उमीद
उसी के ही दुनिया में बनते हैं काम

इसे सिर्फ़ वोटों से मतलब 'दिनेश'
सियासत कहाँ करती फ़िक्रे अवाम

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by दिनेश कुमार on April 6, 2015 at 7:16pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. भाई मिथिलेश जी। सराहना के लिए आभार।
Comment by दिनेश कुमार on April 6, 2015 at 7:12pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. भाई निर्मल नदीम जी।
Comment by दिनेश कुमार on April 6, 2015 at 7:11pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. भाई लक्ष्मण धामी जी।
Comment by दिनेश कुमार on April 6, 2015 at 7:10pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. भाई नजील जी।
Comment by दिनेश कुमार on April 6, 2015 at 7:08pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर जी। आभारी हूँ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 6, 2015 at 5:08pm

रखे जो सदा हौसला और उमीद
उसी के ही दुनिया में बनते हैं काम.................बहुत सुन्दर शेर कहा है आ० दिनेश कुमार जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 6, 2015 at 4:59pm

आदरणीय गिरिराज सर शंका समाधान के लिए आभार.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 6, 2015 at 4:47pm

आदरणीय दिनेश भाई , ज़िन्दगी की सच्चाइयाँ बयान करती आपकी ग़ज़ल के लिये आपको बधाई !!

आदरणीय - मेरी सीमित जानकारी के अनुसार किसी बह्र मे अंतिम मात्रा 1 नही होती , इस एक मात्रा को छूट की तरह इस्तेमाल किया जाता है , जिसे अन्य मिसरों मे निभाना ज़रूरी नहीं होता है । अतः आपकी लिखी ग़ज़ल की मात्रा का भार  122 122 112 12 होना चाहिये । सादर !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 6, 2015 at 4:30pm

न जाने सभी की ये फितरत है क्यूँ
मुसीबत में ही याद आते हैं राम

इस शेर के हवाले से ग़ज़ल पर ढेर सारी दाद कुबूल फरमाएं आदरणीय दिनेश भाई जी 

Comment by Nirmal Nadeem on April 6, 2015 at 1:08pm

BAHUT KHOOOB BHAI WAAAH WAAAAH. BAHUT UMDA

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