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एक हिंदी ग़ज़ल/आ चली आ सितम

बह्र-212 212 212 212
बाअदब नजरे पेश
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चीज है क्या ज़रा देख लूँ बेरहम।
दर्द की है कसम आ चली आ सितम। (१)
****
नूर तो आँख का ले गये हो चुरा,
चाँदनी रात का दे रहे क्यों भरम। (२)
****
हो रही नग्न है नाचती ये ख़ुशी,
क्या नजर चाहती देखना ये हरम। (३)
****
देश को बेचतें आज भी लोग जो,
मोल दे दो उन्हें बेच देगें धरम। (४)
****
माँगते हम नहीं भीख तुमसे कभी,
राह चलते गिरें सम्हलें क्या शरम। (५)
****
लो सतालो हमें फिर रुलालो हमें,
वो लहू भी नहीं अब रहा,हो गरम। (६)
****
खेल ये मात शह का शिकारी सभी,
सत्य का सर झुका है उठा तो कलम। (७)

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मौलिक एवं अप्रकाशित
सुनील शाहाबादी।

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Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 7, 2015 at 9:50pm
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी आपसे आशीष पाकर रचना कर्म सार्थक प्रतीत हुई स्नेह बनाये रखें विनीत हूँ भाई आपका अंतस: आभार।
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 7, 2015 at 9:50pm
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी आपसे आशीष पाकर रचना कर्म सार्थक प्रतीत हुई स्नेह बनाये रखें विनीत हूँ भाई आपका अंतस: आभार।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 7, 2015 at 9:38pm

आदरणीय सुनील भाई , एक कामयाब गज़ल के लिये आपको दिली मुबारकबादें , बधाइयाँ ॥

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 7, 2015 at 8:50pm
आत्मन् मिथलेश जी मुझे भी ऐसा महसूस हुआ था परन्तु एक दो बार गाने के बाद सुर आप ही सही हो गये क्योकि बहर का अपना असर आ ही जाता है बस कहन का अंदाज पकड़ने की कोशिस होनी चाहिये आप हमारी रचना पर गौर करतें और अनमोल सुझावों से नवाजतें हैं इसके लिए आपको दिली शुक्रिया प्यार बनायें रखें आपका आभारी हूँ
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 7, 2015 at 8:42pm
आदरणीय महर्षि त्रिपाठी जी आपकी सराहना पाकर अभिभूत हूँ सादर आभार।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 7, 2015 at 7:45pm
आदरणीय सुनील जी इस प्रस्तुति पर बधाई। बह्र सहज होने पर भी मिसरों पर बह्र का दबाव महसूस हो रहा है। सादर।
Comment by maharshi tripathi on April 7, 2015 at 5:54pm

बहुत सुन्दर आ. सुनील प्रसाद(शाहाबादी) जी ,,हार्दिक बधाई |

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