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लघुकथा : साहस (गणेश जी बागी)

“मास्टर साहब तनिक मेरे छोटका बेटा को समझाइये न, गलत संगत में पड़ वह अपनी जिन्दगी और खानदान का नाम... दोनों बर्बाद कर रहा है.”  

मास्टर साहब को चुप देख प्रधान जी पुनः बोल पड़े.

“आप तो उसे ऊँगली पकड़ कर चलना सिखाये हैं आप की बात वो जरुर मानेगा.”

“प्रधान जी आपके कहने से पहले ही मैंने सोचा था कि उसे समझाऊं किन्तु ...”

किन्तु क्या मास्टर साहब ?

"प्रधान जी क्षमा चाहूँगा किन्तु कीचड़ से सनी उसकी जूती तथा अपना उजला लिबास देख उसे समझाने का साहस मैं नहीं जुटा सका."

(मौलिक व अप्रकाशित)
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Comment by kanta roy on July 28, 2015 at 10:39am
वाह !!!!! कीचड़ में सनी जूती से उजले लिबास का बच कर निकलना ..... बहुत बडी़ बात कह गये आप आदरणीय गणेश बागी जी । बधाई
Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 4, 2015 at 4:42pm

आदरणीय बागी जी कथा लघु है मगर बहुत बड़ी बात की तरफ इशारा करती है आपकी यह रचना ..मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 20, 2015 at 5:02pm

लघुकथा पर उपस्थिति एवं सराहना हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीया सविता मिश्रा जी.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 20, 2015 at 5:00pm

आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी, लघुकथा पर खुबसूरत काव्य पक्तियों के साथ उपस्थित होना सुखकर लगा, बहुत बहुत आभार.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 20, 2015 at 4:59pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी, लघुकथा पर आपका आशीर्वाद मिला, बहुत बहुत आभार.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 20, 2015 at 4:58pm

सराहना हेतु हृदय से आभार आदरणीय जितेन्द्र पस्तारिया जी.

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 17, 2015 at 11:02pm

सुन्दर लघुकथा! बधाई आदरणीय!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 17, 2015 at 3:17pm

प्रधानजी को अपने बेटे के भविष्य़ को सुधारने की चिंता तब हुई जब वह पूरी तरह से लहेंडा हो चुका था. ऐसे ’बूढ़े तोते’ क्या पोस मानते हैं ? मास्टरजी के उत्तर के माध्यम से आपने संयत बात साझा की है.

वैसे इस लघुकथा में ’आपकी वाली बात’ तनिक कम है.

हार्दिक शुभकामनाएँ भाई गणॆश बाग़ीजी..

मेरी पहली वाली टिप्पणी लगता है, ’उड़’ गयी !!.. ..

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 17, 2015 at 10:14am

काजल की कोठ्ररी हो या कीचड भरी राह,   हम तो ऐसे ही बच निकलेंगे.....सच्चे गुरु की वाह !  परमार्थ से भरपूर लघु कथा.  हार्दिक बधाई.   सादर

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 17, 2015 at 9:45am
क्या समझायेंगे मास्टर साहब, जो परिवार और परिवेश समझा देता है। दुनियाँ भर के शिक्षाविद यही मानते हैं , बताते हैं , बस हम हैं जो इसे न जानते हैं , न मानते हैं।
बहुत सही, सशक्त , प्रभावशाली लघु- कथा , बहुत बहुत बधाई , आदरणीय इंजीo गणेश जी बागी जी, सादर।

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