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ग़ज़ल-नूर: जिस्म का क्या हुआ ख़बर न हुई.

२१२२/१२१२/२२ (सभी संभावित कॉम्बिनेशन्स)

ज़िन्दगी हाल का सफ़र न हुई
जैसे इक रात की सहर न हुई.
.

तेरी जानिब मैं देखता ही रहा
मेरी जानिब तेरी नज़र न हुई.
.
फ़ायदा क्या हुआ ग़ज़ल होकर
तर्जुमानी तेरी अगर न हुई.
.
पहले पहले हया का पर्दा रहा
फिर ज़रा भी अगर मगर न हुई .
.
दिल की मिट्टी पे पड़ गयी मिट्टी
याद तेरी इधर उधर न हुई.
.
ख़ुद को भूला तुझे भुलाने में
कोई तरकीब कारगर न हुई.
.
‘नूर’ बिखरा था याद है मुझको
जिस्म का क्या हुआ ख़बर न हुई.   
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 893

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 23, 2015 at 11:28am

शुक्रिया आ. लक्ष्मण जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 23, 2015 at 11:28am

शुक्रिया आ. गिरिराज जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 23, 2015 at 11:27am

शुक्रिया डॉ. आशुतोष जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 23, 2015 at 11:27am

शुक्रिया आ. धर्मेन्द्र जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 23, 2015 at 11:27am

शुक्रिया आ. जितेन्द्र जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 23, 2015 at 10:52am

आ0 भाई नीलेश जी बेहतरीन गजल हुई है । हार्दिक बधाई स्वीकारें ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 22, 2015 at 3:48pm

‘नूर’ बिखरा था याद है मुझको
जिस्म का क्या हुआ ख़बर न हुई.    -- जानदार मक्ता , और गज़ल के लिये दिली बधाइयाँ स्वीकार करें ॥

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 22, 2015 at 1:44pm

पहले पहले हया का पर्दा रहा 
फिर ज़रा भी अगर मगर न हुई...बेहतरीन 

नूर’ बिखरा था याद है मुझको
जिस्म का क्या हुआ ख़बर न हुई.   ..बहुत ही शानदार 

आदरणीय नूर जी एक और शानदार ग़ज़ल के लिए तहे दिल बधाई  सादर 
.

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 22, 2015 at 10:30am

बहुत खूब आदरणीय नूर साहब। इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए दाद कुबूल फ़रमाइये।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 22, 2015 at 10:06am

पहले पहले हया का पर्दा रहा
फिर ज़रा भी अगर मगर न हुई .
.
दिल की मिट्टी पे पड़ गयी मिट्टी
याद तेरी इधर उधर न हुई...........जिन्दावाद अशआर. दिली बधाई आपको आदरणीय निलेश जी

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