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ग़ज़ल -- हर काम यूँ करो कि हुनर बोलने लगे

221-2121-1221-212

हर काम यूँ करो कि हुनर बोलने लगे
मेहनत दिखे सभी को, समर बोलने लगे

उस बेवफ़ा से बोलना तौहीन थी मेरी
लेकिन ये मेरे ज़ख़्म-ए-जिगर बोलने लगे

तहज़ीब चुप है इल्मो-अदब आज शर्मसार
देखो पिता के मुँह पे पिसर बोलने लगे

आँखों से मैं ज़बान का ऐसे भी काम लूँ
जो भी मैं कहना चाहूँ नज़र बोलने लगे

सब हमको बुतपरस्त समझते रहे मगर
ऐसे तराशे हमने , हजर बोलने लगे

दैरो हरम के नाम पे जब शह्र बँट गया
दोनों तरफ़ से तेग़-ओ-तबर बोलने लगे

मैंने ग़ज़ल सुनाई ज़फ़र की ज़मीन में
सब दोस्त मेरे मुझको ज़फ़र बोलने लगे

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 26, 2015 at 11:56am

बहुत खूब आदरणीय दिनेश भाई बेहतरीन रचना है हर ग़ज़ल लाजवाब है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Neeraj Neer on April 26, 2015 at 8:05am

वाह ! हार्दिक बधाइयाँ इस सुंदर गजल के लिए ... 

Comment by दिनेश कुमार on April 23, 2015 at 5:34pm
आदरणीय Dr Ashutosh Mishra सर जी, बहुत बहुत शुक्रिया।
Comment by दिनेश कुमार on April 23, 2015 at 5:32pm
आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर जी, बहुत बहुत शुक्रिया।
Comment by दिनेश कुमार on April 23, 2015 at 5:30pm
आदरणीय गिरिराज सर जी, बहुत बहुत शुक्रिया।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 23, 2015 at 3:01pm

आदरणीय दिनेश जी ..बढ़िया ग़ज़ल हुई है ..मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 23, 2015 at 1:36pm

बहुत बढ़िया दिनेश भाई . आख़री शेर ने भी मन मोह लिया . सादर .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 22, 2015 at 7:01pm

आ.दिनेश भाई ,  खूबसूरत गज़ल के लिये दिल से बधाइयाँ स्वीकार करें ॥

Comment by दिनेश कुमार on April 22, 2015 at 4:26pm
हौसला अफज़ाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय भाई धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी।
Comment by दिनेश कुमार on April 22, 2015 at 4:25pm
हौसला अफज़ाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय निलेश भाई जी। आप ठीक कहते हैं, अनुभवी लोगों से बहुत कुछ सीखने को मिलता है।

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