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 किसी साहित्यिक गोष्ठी में पहली बार शामिल हुआ था वह I सीखने को आतुर मन !! चर्चा जोरों पर थी साहित्य का स्वरुप क्या हो ? असमंजस में पड़ गया वो !! दिल से लिखी गयी कुछ पंक्तियों के लिए कल कितनी कटु आलोचना सहनी पड़ी थी उसे I मन का लेखक अब लेखनी से त्रस्त होकर सोच रहा था कि ...... " किसके लिए लिखे वो ? " 

मीना पाण्डेय
बिहार
मौलिक व् अप्रकाशित

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Comment by Dr. Vijai Shanker on April 28, 2015 at 6:20pm
आदरणीय सुश्री मीणा पाण्डेय जी, एक बहुत ही सार्थक विषय लिया आपने अपनी लघु- कथा में, साहित्य का स्वरुप निर्धारित करने जैसी बात, और किसके लिए लिखे वह, क्यों कि जब भी स्थापित मूल्यों के विरुद्ध लिखेगा आलोचना तो झेलेगा ही , साहित्य में कोई नै बात लेकर प्रविष्ठ होना उतना ही कठिन होता है जितना एक रूढ़िवादी समाज में किसी रूढ़ि के खिलाफ आवाज उठाना , दोनों ही जगह आपको स्वयं स्थापित ठेकेदारों से सामना करना पड़ता है , क्योंकि जड़ता दोनों ही जगह होती है ,और जड़ तो फिर जड़ ही होता है , परिवर्तन को त्याज्य समझने वाला.
……… सिर्फ तीन पंक्तियों में इतनी बड़ी बात को कह डालना बहुत ही प्रशंसनीय है , बहुत बहुत बधाई, पर कहीं लिखने में कुछ अस्पष्ट रह गया है , उसे स्वयं देख लें।
सादर।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 28, 2015 at 1:41pm

आदरणीया मीनाजी, आप अपनी प्रस्तुति को स्वयं एक बार देख लें. लघुकथा के प्रस्तुतीकरण में तनिक सुधार अपेक्षित है.

क्या ’उलझन’ किसी का नाम है ? एकबारग़ी लगता तो ऐसा ही है. फिर प्रस्तुति के क्रम में ही आपका नाम, परिचय आदि अंकित हो गये हैं.

लघुकथा का विषय साहित्य के हिसाब से बड़ा प्रासंगिक है. इस विन्दु पर आपकी सोच सान्द्रता चाहती है, जानना सुखद लगा.

शुभेच्छाएँ

Comment by neha agarwal on April 28, 2015 at 1:38pm
वाह दी
Comment by Shyam Narain Verma on April 28, 2015 at 10:42am
इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई

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