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हर तरफ है छटपटाहट बोलता कोई नहीं
या हमारी मुश्किलो को जानता कोई नहीं
वो बहुत मज़बूर है या देने की नियत नहीं
या हमारी ख्वाहिशो की इंतहा कोई नहीं
वो अपनी मिट्ठी ज़ुबा से फिर तसल्ली दे गया
और हमारे दर्द की यारो ज़ुबा कोई नहीं
अपने जी का दर्द हम किस्से कहे तू ये बता
अपना तो तेरे शहर में तेरे सिवा कोई नहीं
उसने एक फहरिसित् दी है अपने रिस्तेदारो की
नाम मेरा भी लिखा आगे लिखा कोई नहीं




मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by MAHIMA SHREE on May 1, 2015 at 6:08pm

अच्छी प्रस्तुति बधाई

Comment by मनोज अहसास on May 1, 2015 at 4:41pm
सिखने की प्रक्रिया में हु सर मेहरबानी
आप सब का आशीर्वाद शायद कुछ सिखा दे

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 1, 2015 at 3:25pm
आदरणीय मनोज जी प्रस्तुति पर बधाई।
हिज्जे और काफ़िया निर्धारण पर पुनर्विचार निवेदित है।

कृपया ध्यान दे...

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