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शम्स तो है वो मगर डूबा हुआ है-शिज्जु शकूर

2122 2122 2122

शम्स तो है वो मगर डूबा हुआ है

रौशनी से बेख़बर डूबा हुआ है

 

अपने होने का उसे अहसास तो हो

क्यों ग़मों में इस कदर डूबा हुआ है

 

क्या अँधेरा मेरी नज़रों में है मौजूद

या अँधेरे में ये घर डूबा हुआ है

 

रौशनी के सिर्फ इक ज़र्रे के दम पर

ठण्ड से वो बेअसर डूबा हुआ है           

 

इस जुनूने इश्क़ का होगा समर* क्या           *नतीजा

सोच में कोई इधर डूबा हुआ है

 

फिर गुजश्ता वक्त के किस्सों में तू क्यों

आँसुओं से तर ब तर डूबा हुआ है

 

उसकी दुनिया तो किताबों की है दुनिया

वो झुकाये अपना सर डूबा हुआ है

 

मौलिक व् अप्रकाशित 

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 10, 2015 at 11:28am

आदरणीय सौरभ सर रचना पर आपकी उपस्थिति उत्साह का कारण हुआ करती है आपका हार्दिक आभार स्नेह बनाये रखें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 10, 2015 at 11:27am

आदरणीय केवल प्रसाद जी आपका हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 10, 2015 at 11:26am

भाई कृष्ण मिश्रा जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 10, 2015 at 11:26am

आदरणीय वीनस जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया, मिसरा सुधार दिया है :-)


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 10, 2015 at 11:25am

आदरणीय मिथिलेश जी नवाज़िशों के लिये बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 10, 2015 at 11:24am

आदरणीय गिरिराज सर रचना की सराहना के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 10, 2015 at 11:23am

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर आपका तहेदिल से शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 10, 2015 at 11:21am

आदरणीय निलेश भैया आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 10, 2015 at 11:20am

आदरणीय श्याम नारायण जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 7, 2015 at 11:53pm

क़ामयाब ग़ज़ल के लिए दिल से बधाइयाँ, शिज्जू भाई.. दिल से हुई इस ग़ज़ल को दिल से सुन गया

कृपया ध्यान दे...

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