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एक पर्वत की व्यथा - कविता

गर्व से सर उठाये

पर्वत की शिखरोँ को

सूर्य की किरण, सर्वप्रथम

व अंतिम किरण, अंत तक

निज दिन चूमती है

परंतु चकित हूँ

यह फिर भी हरित नहीँ होती

हरित होती हैँ घाटियाँ

जीवन वहीँ विचरता है

किँचित यह ओट देने का श्राप है

अथवा दमन का प्रतिशोध

कि जल की एक बूँद नहीँ ठहरती यहाँ

जल स्त्रोत इसी गोद मेँ जन्म ले

पलायन कर जाते हैँ

हवा की सनसनाहट

बादलोँ की गडगडाहट

के अतिरिक्त कोई स्वर नहीँ गूँजता

यदा कदा कोई पद चाप सुनाई देती है

परंतु यह हर्ष का नहीँ विषाद का स्वर है

उसके शीर्ष पर गडी एक पताका

उसे बोध दिलाती है

वह अजय नहीँ, पराजित है

 

मौलिक एँव अप्रकाशित 

 

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Comment by मिथिलेश वामनकर on May 11, 2015 at 9:20am

आदरणीय मोहिंदर जी इस विशिष्ट प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 8, 2015 at 2:01pm

अच्छी प्रस्तुति है .

Comment by Dr.Rupendra Kumar Kavi on May 8, 2015 at 11:55am

मार्मिक कविता है

कृपया ध्यान दे...

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