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ग़ज़ल : मैं तो नेता हूँ जो मिल जाए जिधर, खा जाऊँ

बह्र : २१२२ ११२२ ११२२ २२

 

मैं तो नेता हूँ जो मिल जाए जिधर, खा जाऊँ

हज़्म हो जाएगा विष भी मैं अगर खा जाऊँ

 

कैसा दफ़्तर है यहाँ भूख तो मिटती ही नहीं

खा के पुल और सड़क मन है नहर खा जाऊँ

 

इसमें जीरो हैं बहुत फंड मिला जो मुझको

कौन जानेगा जो दो एक सिफ़र खा जाऊँ

 

भूख लगती है तो मैं सोच नहीं पाता कुछ

सोन मछली हो या हो शेर-ए-बबर, खा जाऊँ

 

इस मुई भूख से कोई तो बचा लो मुझको

इस से पहले कि मैं ये शम्स-ओ-क़मर खा जाऊँ

-----------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 27, 2015 at 10:21am
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 18, 2015 at 6:38pm

जाने आपके ’नेता’ की इच्छा कहाँ तक फलीभूत हुई. लेकिन आपके ग़ज़लकार को मुझसे ’वाह-वाह’ अवश्य सुनना चाहिये..
बहुत खूब !

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 16, 2015 at 1:27pm

शुक्रिया आ. वीनस जी

Comment by वीनस केसरी on May 16, 2015 at 1:20am

बहुत खूब जनाब, नाम न भी दिखता तो मैं बता देता ये किसकी ग़ज़ल है

जिंदाबाद भाई

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 13, 2015 at 10:20pm

आ. केवल प्रसाद जी विष पिया और खाया दोनों जाता है। मुझे आश्चर्य है कि आपने आज तक "उसने विष खाकर अपनी जान दे दी", "उसने विष खा लिया" जैसा वाक्य नहीं पढ़ा। क्योंकि विष तरल और ठोस दोनों अवस्थाओं में हो सकता है। जहर के साथ भी यही नियम लागू है, उसे भी खाया और पिया दोनों जा सकता है।

अश’आर पसंद करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 13, 2015 at 10:17pm

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आ. गिरिराज भंडारी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 13, 2015 at 10:17pm

बहुत बहुत शुक्रिया जनाब इंतज़ार साहब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 13, 2015 at 10:16pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ. मिथिलेश वामनकर  जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 13, 2015 at 10:16pm

शुक्रिया आ. Vijai Shanker जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 13, 2015 at 10:15pm

बहुत बहुत शुक्रिया जनाब Samar kabeer  साहब

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