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"पहले तो हमें नौकरी ही नहीं मिलती। अगर मिल भी जाए तो सालों साल रगड़ते रहो, कोई प्रमोशन नहीं। और एक ये हैं ?"

"और लो जन्म ऊँची जात में।"

पिघले हुए सीसे की तरह ये शब्द उसके कानों में उतर रहे थे । 

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on June 4, 2015 at 11:24pm

बिलकुल ठीक कहा आपने आदरणीया रीता गुप्ता जी , बहुत बहुत आभार ..

Comment by Rita Gupta on June 4, 2015 at 11:10pm

विनय जी एक कडवी सच्चाई आपने चंद  शब्दों में दर्ज की है .वैसे ये एक बहुत बड़े बहस का एक पक्षीय सुंदर प्रस्तुति है . 

Comment by विनय कुमार on June 4, 2015 at 9:08pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय शुभ्रांशु पाण्डेय जी , सही कहा आपने , अपने अपने तर्क .

Comment by Shubhranshu Pandey on June 4, 2015 at 8:51pm

आदरणीय विनय जी 

एक विवादित विषय जिस पर दोनो पक्षों के अपने अपने तर्क हुआ करते हैं.

सुन्दर कथा.

सादर.

Comment by विनय कुमार on June 3, 2015 at 11:33pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय वीर मेहता जी ..

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on June 3, 2015 at 11:25pm
आदरणीय विनय जी सुन्दर प्रस्तुति। कम शब्दो में सटीक कथा।
सादर बधाई ।
Comment by VIRENDER VEER MEHTA on June 3, 2015 at 11:23pm
आदरणीय विनय जी सुन्दर प्रस्तुति। कम शब्दो में सटीक कथा।
सादर बधाई ।
Comment by विनय कुमार on June 3, 2015 at 11:06pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय कृष्ण मिश्रा जान गोरखपुरी जी ..

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 3, 2015 at 10:31pm

वाह! आ० विनय जी बेहतरीन लघुकथा हुयी!हार्दिक बधाई व् शुभकामनायें!

Comment by विनय कुमार on June 3, 2015 at 12:08pm

बहुत बहुत आभार आदरणीया सरस दरबारी जी .

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