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विनय कुमार's Blog (201)

हमें क्या हो गया है-- छोटी सी कहानी

उसके सब्र की इन्तेहाँ हो रही थी, लगभग दो घंटे बीत चुके थे उसे पार्क में आये हुए. घर में सुबह ही उसे पता चल गया था कि परी अपनी माँ के साथ आ रही है. छह महीने तो बीत ही चुके थे उसे परी को देखे लेकिन कोई रास्ता भी नहीं था उसके पास जिससे वह परी को एक नजर देख भी सके. पत्र लिखने की हिम्मत कहाँ से आती जबकि उसे खुद पता नहीं था कि परी उसके लिए क्या सोचती है. 

साथ पढ़ते थे दोनों और एक ही मोहल्ले में रहते थे, उस समय आने जाने के लिए बहुत हुआ तो एक साइकिल मिल जाती थी, वर्ना पैदल ही स्कूल जाना और…

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Added by विनय कुमार on February 8, 2022 at 4:42pm — 1 Comment

देना कब सीखेंगे हम-कविता

नदी जीवन देती है

नदी पालती है

नदी सींचती है

नदी बहना सिखाती है

नदी सहना सिखाती है

नदी बदलाव समझाती है

नदी ठहराव समझाती है

नदी हंसना सिखाती है

नदी अंत तक साथ देती है.



पहाड़, धरती, प्रकृति भी

हमें यही सब सिखाते हैं,

लेकिन हम क्या कर रहे हैं?

हम नदी को धीरे धीरे,

तिल तिल कर मार रहे हैं,

हम अपना सारा कचरा

बेदर्दी से इसमें उड़ेल रहे हैं,

हम प्रकृति को बर्बाद कर रहे हैं

हम धरती को बंजर बना रहे हैं

हम पहाड़ों को…

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Added by विनय कुमार on May 12, 2021 at 3:59pm — 2 Comments

हम क्यों जीते हैं--कविता

हम सांस लेते हैं, हम जीते हैं

और एक दिन आखिरी सांस लेते हैं

इस आखिरी सांस के पहले

हमारे पास वक़्त होता है

अपनों के लिए कुछ करने का

समाज को कुछ लौटाने का

ऐसी वजह बनाने का

जिससे लोग याद रखें

आखिरी सांस लेने के बाद भी,

मगर अमूमन हम

बस अपने लिए ही जीते हैं

और अंत में मर जाते हैं

बिना किसी के लिए कुछ किये.

हम पेड़ पौधों से नहीं सीखते

हम तमाम जानवरों से भी नहीं सीखते

हम नहीं सीखते औरों के लिए जीना

हमारी दुनिया वास्तव में…

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Added by विनय कुमार on May 11, 2021 at 6:10pm — 6 Comments

संवेदना--लघुकथा

उस उजाड़ से गांव में बस कुछ टूटीफूटी झोपड़ियां ही मौजूद थीं जो वहाँ के लोगों के आर्थिक दशा और सरकार के विकास के नारे की तल्ख सच्चाई बयान कर रही थीं. उसको थोड़ा अजीब लगा, उसने अपने स्टाफ की बात को गंभीरता से नहीं लिया था. दरअसल जब भी इस गांव के लोगों से वसूली की बात होती, स्टाफ मना कर देता कि वहाँ जाने से कोई फायदा नहीं होगा. "सर, वहाँ लोगों के पास अभी खाने को नहीं है, बैंक की किश्त कैसे चुकाएंगे", अक्सर उसे यही बात सुनने को मिलती थीं.

लेकिन उसे लगा कि शायद दूर होने और वहाँ पैदल जाने के…

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Added by विनय कुमार on April 4, 2021 at 4:30pm — 6 Comments

मातृत्व- लघुकथा

पूरी रात वह सो नहीं पाया था, आँखों आँखों में ही बीती थी पिछली रात. लेकिन कमाल यह था कि न तो कोई थकान थी और न ही कोई झल्लाहट. उसे अच्छी तरह से याद था कि इसके पहले जब भी रात को जागना पड़ जाए या किसी वजह से रात को देर तक नींद नहीं आये तो अगला पूरा दिन उबासी लेते और थकान महसूस करते ही बीतता था. उसे हमेश यही लगता रहा कि कहीं वह छोटा सा बच्चा उससे दब न जाए और उसी चक्कर में वह हर आधे घंटे पर उठ उठकर उसे देखता रहा. और वह बच्चा भी पूरी रात उसके बिस्तर पर घूमता रहा, कभी सिरहाने तो कभी पैरों की तरफ.पूरी…

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Added by विनय कुमार on February 8, 2021 at 11:11pm — 8 Comments

पिता--लघुकथा

"अरे, कल तक तो आप ठीक लग रहे थे, आज इतना परेशान दिख रहे हैं. रात में फिर से बुखार तो नहीं आया था, दवा तो ले रहे हैं ना. ये कोविड भी जो न कराये, सारा देश परेशान है?, पत्नी ने उसके चिंतित चेहरे को देखते हुए कहना जारी रखा. कोविड के चलते वह दूर से ही खाना, पानी इत्यादि दे रही थी और बीच बीच में आकर हाल भी पूछ जाती थी.

"मैं तो बिलकुल ठीक हूँ लेकिन बेटी का बुखार उतरा कि नहीं, कहीं मेरे चलते उसे भी संक्रमण न हो जाए?, उसने शायद पत्नी की बात पूरी सुनी ही नहीं. 



मौलिक एवं…

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Added by विनय कुमार on September 16, 2020 at 10:49am — 6 Comments

दर्द का रिश्ता- लघुकथा

बहुत चहल पहल थी आज, अमूमन सप्ताहांत में थोड़ी भीड़ होती है लेकिन ऐसी भीड़ साल में दो ही दिन देखने को मिलती है, एक आज के दिन और एक मदर्स डे पर. शर्माजी एक कुर्सी पर बैठे हुए कुछ हमउम्र बुजुर्गों को देखते हुए सोच रहे थे, कुछ के चेहरे पर ख़ुशी, कुछ पर उम्मीद तो कुछ चेहरे निराश भी थे. कुछ लोग बाहर भी गए थे, उनके बच्चे ले गए थे आज के दिन को यादगार बनाने के लिए. अब बिना सेल्फी या साथ फोटो लिए भला कैसे सोशल मीडिया पर फादर्स डे मनता।

एक कार बाहर रुकी, मल्होत्रा जी उससे बाहर निकले और खड़े हो गए.…

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Added by विनय कुमार on June 22, 2020 at 7:18pm — 4 Comments

गुरूर- लघुकथा

लगभग दो महीने होने को आये थे इस भयानक त्रासदी को और राकेश इस पूरे समय में लोगों की मदद के लिए हर समय तैयार था. दिन हो या रात, सुबह हो या शाम, बस किसी भूखे या परेशान के बारे में पता चलते ही वह अपनी टीम या कभी कभी अकेले ही निकल पड़ता था.

"भाई, तुम तो हर तरफ छा गए हो, समाचार पात्र हो या लोकल टी वी, जिसे देखो वही तुम्हारी बात कर रहा है", दोस्त का फोन आया तो वह मुस्कुरा पड़ा.

"देखो यार, ऐसा मौका जीवन में जब भी आये, अपनी तरफ से सब कुछ झोंक देना चाहिए. आखिर हम कुछ लोगों की तो मदद करने में…

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Added by विनय कुमार on May 21, 2020 at 6:08pm — 6 Comments

अब नहीं- लघुकथा

"पापा, अब तो आप नहीं जाओगे ना?, बेटा पिता को पकड़े हुए कह रहा था, साल भर बाद उसने पिता को देखा था.

उसके सामने पिछले सात दिन का खौफनाक मंजर छा गया, कभी पैदल, कभी ट्रक में, कभी किसी टेम्पो में चलते हुए बस वह आ गया था. उसके एक दो साथी तो रास्ते में ही चल बसे थे.

उसने पत्नी की तरफ देखा, जिसकी आँखें मानो कह रही थीं "तुम बस सलामत रहो, दो वक़्त की रोटी तो हम खा ही लेंगे".

उसने अपने भविष्य की चिंता को झटकते हुए कहा "अब मैं कहीं नहीं जाऊँगा बेटा, यहीं रहूँगा, तुम्हारे पास".

बेटा खुश…

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Added by विनय कुमार on May 19, 2020 at 6:28pm — 8 Comments

कोरोना तेरा मुंह काला--गीत

आखिर खुल गया ताला
होगा अब देश मतवाला


पुराने जमाने की बात थी
धंधा कहते थे, उसे काला


गरीब रोटी  को  रोता था
किसने ये गलत कह डाला


हस्पताल  खोलना क्यूँ है
जब हाथ हो सबके प्याला


किसे पढ़ना है बताओ तो
जब विषय ही बदल डाला


दूरी की चिंता  कौन करे
धज्जी उसकी उड़ा डाला


अब इकोनॉमी चमकेगी
कोरोना तेरा मुंह काला !!

Added by विनय कुमार on May 4, 2020 at 5:53pm — 8 Comments

अलग फ़िक्र --लघुकथा

"क्या बहन, कल से बंदी ख़तम हो जायेगी?, एक बाई ने अपने दरवाजे से सामने वाले घर की बाई से पूछा.
"पता नहीं रे, हो सकता हैं ख़तम हो जाए", उसने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की.
"अच्छा तो ये बताओ कि क्या बंदी ख़त्म होते ही दारू की दुकान भी खुल जायेगी?, पहली ने फिर पूछा.
दूसरी ने लगभग घबराते हुए कहा "ख़तम नहीं होता तो अच्छा था".


मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on May 2, 2020 at 12:52pm — 6 Comments

नारियल- लघुकथा

"आज तो मैं जा के ही रहूंगी, चाहे पुलिस का डंडा ही क्यों न खाना पड़े", उसने एक नजर बिस्तर पर बीमार पड़े पति और भूख से बेचैन दोनों बच्चों को देखते हुए कहा.

बड़े बेटे ने साथ में सुर मिलाया "मैं भी चलूँगा अम्मा, वो तीसरे माले वाली ऑन्टी मुझे कितना मानती हैं".

उसने दृढ़ता से मना कर दिया "मुझे तो शायद छोड़ देंगे लेकिन तुझे नहीं छोड़ेंगे. तू यही छोटे का ख्याल रख, मैं कुछ लेकर आती हूँ".

बाहर निकलकर जैसे ही वह सड़क पर पहुंची, एक पुलिसवाला डंडा फटकारते हुए आया "कहाँ जा रही है, पता नहीं है कि…

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Added by विनय कुमार on April 22, 2020 at 5:30pm — 4 Comments

भय- लघुकथा

दरवाजे पर दस्तक हुई और आवाज आयी 'दीदी, मैं आयी हूँ".

उसने आवाज पहचान लिया और दरवाजा खोल दिया. बाई अंदर आयी और नमस्ते करके खड़ी हो गयी.

"कैसी हो बाई, घर में सब ठीक है ना?, उसने पूछ तो लिया लेकिन उसे अपनी आवाज ही खोखली लग रही थी.

"सब ठीक ही है दीदी, क्या कहें?, बाई ने कुछ नहीं कहते हुए भी सब कुछ कह दिया.

"अच्छा ये लो पैसा, थोड़े ज्यादा पैसे भी दे दिया हैं. अपना ख्याल रखना", उसने बाई के हाथ में पैसे रख दिए.

बाई ने पैसे वैसे ही अपने छोटे से पर्स में रख लिए. वह पलट कर जाने लगी… Continue

Added by विनय कुमार on April 20, 2020 at 3:40pm — 4 Comments

जिम्मेदारियाँ--लघुकथा

आज वह सोचकर आया था कि पापा से नई घडी और पैंट शर्ट के लिए कह ही देगा. अब तो स्कूल के बच्चे भी कभी कभी चिढ़ाने लगे थे. लेकिन घर की हालत देखकर उसकी कहने की इच्छा नहीं होती थी. जैसे ही वह पापा के कमरे में पहुंचा, पीछे पीछे उसका चचेरा भाई भी आ गया. अभी वह कुछ कहता तभी उसके चचेरे भाई ने अपनी फरमाईस रख दी "बड़े पापा, मेरी साइकिल बिलकुल खचड़ा हो गयी है, इस महीने नई दिला दीजिये".

पापा ने उसकी तरफ प्यार से देखते हुए कहा "ठीक है, इस बार बोनस मिलना है, जरूर खरीद दूंगा. लेकिन संभाल कर चलाना, गिरना…

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Added by विनय कुमार on November 13, 2019 at 5:55pm — 4 Comments

उसका हक़- लघुकथा

जैसे ही छोटू के रोने की आवाज मालती के कानों में पड़ी, वह उठकर भागी. दूसरे कमरे के उसके बिस्तर पर लेटे छोटू की नींद खुल गयी थी, शायद उसने नैप्पी भी गीला कर दिया था.

"अले ले, जग गया मेरा राजा बेटा, भुक्खू लगी है क्या?, मालती ने उसे उठाकर प्यार करना शुरू किया और उसे लाड़ करती हुई ड्राइंग रूम में आ गयी.

ड्राइंग रूम में एक कोने में वह बैठा हुआ अखबार पढ़ रहा था, मालती और छोटू के मिले जुले स्वर से उसकी तन्द्रा भंग हुई. उसके चेहरे पर भी उनको देखकर मुस्कराहट आ गयी. वह उठकर छोटू को लेने ही जा रहा…

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Added by विनय कुमार on October 7, 2019 at 6:42pm — 8 Comments

समीकरण- लघुकथा

अचानक उसे लगा कि पीछे से किसी ने नाम लेकर पुकारा, उसने साइकिल रोकी और पलट कर देखा. थोड़ा पीछे ही उसके परिचित वकील साहब खड़े थे और उसकी तरफ इशारा कर रहे थे. वह साइकिल धीरे धीरे चलाते हुए वकील साहब के पास पहुंचा और उनको नमस्ते किया.

"क्या बात है मैनेजर साहब, आज साइकिल चला रहे हैं. गाड़ी पंचर हो गयी है या खराब है", वकील साहब ने मुस्कुराते हुए पूछा.

उसे हंसी आ गयी, वह क्या साइकिल सिर्फ तभी चला सकता है जब उसकी गाड़ी खराब हो. फिर उसने हँसते हुए ही कहा "अरे नहीं वकील साहब, गाड़ी ठीक है. बस यूँ…

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Added by विनय कुमार on September 26, 2019 at 5:49pm — 4 Comments

व्यस्तता- लघुकथा

"अब गांव चलें बहुत दिन बिता लिए यहाँ", शोभाराम ने जब पत्नी ललिता से कहा तो जैसे उनके मुंह की बात ही छीन ली.

लेकिन बेटे और बहू से क्या कहेंगे, गांव पर तो कोई रहता नहीं था,पट्टीदारों के अलावा. वैसे वहां पर अपने हिसाब से जीने की आज़ादी थी लेकिन यहाँ भी तो है ही, कोई बंधन नहीं है. उनके दिमाग में कई दिनों से यह सब घूम रहा था.

"अच्छा यह बताओ, आखिर क्या कह कर गांव जाओगे. बेटा तो यही कहकर शहर लाया था कि गांव में अकेले रहते हैं, कौन है जो आपका अकेलापन बाँटने के लिए", ललिता के सवाल पर लाजवाब हो…

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Added by विनय कुमार on September 17, 2019 at 7:36pm — 6 Comments

उजास- लघुकथा

घर तक पहुँचते पहुँचते वह बिलकुल थक के चूर हो गया था, थकान सिर्फ शारीरिक होती तो और बात थी, वह मानसिक ज्यादा थी. आज भी कुछ लोगों की खुसुर फुसुर उसके कानों में पड़ गयी थी "अरे ये तो सरकारी दामाद हैं, इनको कौन बोल सकता है, जो चाहे करें". जैसे ही वह सोफे पर बैठा, उसकी नजर सुपुत्र राघव पर पड़ी. उसकी कुहनी पर खून के दाग थे लेकिन वह मजे में खेल रहा था.

"बेटा राघव, यहाँ आओ. यह चोट कैसे लग गयी", उसने जैसे ही कहा, राघव को अपने चोट का ध्यान आया. वह लड़खड़ाते हुए पापा की तरफ आया और उसकी शिकायत शुरू हो गयी… Continue

Added by विनय कुमार on September 11, 2019 at 7:36pm — 4 Comments

अब बात कुछ और है- लघुकथा

लगभग १५ मिनट बीत गए थे उस रेस्तरां में बैठे हुए, अभी तक खाना सर्व नहीं हुआ था. कलीग के बच्चे के ट्वेल्थ के रिजल्ट की ख़ुशी में आज दोनों फिर उस रेस्तरां में आये थे. अमूमन इतनी देर में बौखला जाने वाली उसकी कलीग ख़ामोशी से मेनू को उलट पलट कर देख रही थी. उसे थोड़ा अजीब लगा, उसने यूँ ही कहा "कितना समय लेते हैं ये बड़े होटल वाले खाना सर्व करने में, मुझे तो समझ ही नहीं आता. वैसे आज तुम कुछ बोल नहीं रही हो, क्या बात है?

कलीग ने सर उठाकर उसकी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए बोली "अरे समय लग जाता है, ये लोग… Continue

Added by विनय कुमार on September 9, 2019 at 5:56pm — 2 Comments

हवस - लघुकथा

पिछले दो घंटे से उसका परिवार इस टाइगर रिज़र्व में घूम रहा था. मौसम भी बेहद शानदार था इसलिए सब खुश थे. अभी तक काफी जानवर दिखाई पड़ गए थे लेकिन शेर से सामना नहीं हुआ था. गाइड लगातार बता रहा था कि वह ऐसी जगह ले चलेगा जहाँ कई शेर देखने को मिलेंगे, पहले बाकी जानवर देख लिए जाएँ. उसने भी सहमति दे दी और उनकी जीप धीरे धीरे जंगल में घूम रही थी.

"अरे यहाँ सिग्नल कमजोर है, आवाज कट रही है. मैंने एक मैसेज किया है, उसे पढ़कर लेक के किनारे वाले फ्लैट की रजिस्ट्री की तैयारी कर लो. मैं परसों तक आ जाऊंगा,…

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Added by विनय कुमार on August 5, 2019 at 4:30pm — 8 Comments

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