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घर तक पहुँचते पहुँचते वह बिलकुल थक के चूर हो गया था, थकान सिर्फ शारीरिक होती तो और बात थी, वह मानसिक ज्यादा थी. आज भी कुछ लोगों की खुसुर फुसुर उसके कानों में पड़ गयी थी "अरे ये तो सरकारी दामाद हैं, इनको कौन बोल सकता है, जो चाहे करें". जैसे ही वह सोफे पर बैठा, उसकी नजर सुपुत्र राघव पर पड़ी. उसकी कुहनी पर खून के दाग थे लेकिन वह मजे में खेल रहा था.
"बेटा राघव, यहाँ आओ. यह चोट कैसे लग गयी", उसने जैसे ही कहा, राघव को अपने चोट का ध्यान आया. वह लड़खड़ाते हुए पापा की तरफ आया और उसकी शिकायत शुरू हो गयी "बहुत गन्दा स्कूल है पापा, सब बच्चे मुझे बहुत चिढ़ाते हैं. आज तो मैदान में किसी ने धक्का दे दिया और मैं गिर पड़ा, देखो खून भी निकल आया".
"अच्छा चलो दवा लगा देता हूँ, घाव ठीक हो जायेगा. एक काम करता हूँ, तुम्हारा नाम किसी और स्कूल में लिखवा देता हूँ, ऐसे गंदे बच्चों से तो पीछा छूटेगा", उसने गंभीरता से कहा.
राघव, जो अभी तक शिकायत के ही मूड में था, वह चौंक सा गया. उसने पापा की तरफ गौर से देखा और बोला "नहीं पापा, मुझे स्कूल नहीं बदलना है. मेरे कितने ही दोस्त हैं जो मेरा ध्यान रखते हैं, मैं वहीँ पढूंगा".
वह सोच में पड़ गया, राघव के पैरों में समस्या थी जिसके चलते वह लंगड़ाकर चलता था. इस वजह से बच्चे उसे बहुत चिढ़ाते थे, यह भी उसे मालूम था. लेकिन फिर भी वह अपने कुछ अच्छे दोस्तों के चलते स्कूल छोड़ने के लिए राजी नहीं था. और वह अपने कुछ कलीग्स के मानसिक विकलांगता के चलते इस्तीफा देने तक के बारे में सोच रहा था.
"तो फिर पार्क में चलें, रेस लगाते हैं", उसने राघव को गोद में उठाते हुए कहा. राघव के चेहरे पर खिलखिलाहट फ़ैल गयी, उसने उस खिलखिलाहट को अपने अंदर भी भर लिया.

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on September 20, 2019 at 6:29pm
इस टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार आ मुहतरम समर कबीर साहब
Comment by Samar kabeer on September 19, 2019 at 11:42am

जनाब विनय कुमार जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by विनय कुमार on September 17, 2019 at 7:08pm

इस उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आ डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 13, 2019 at 12:52pm

आओ विनय जी , बहुत  ही प्रेरक और सुन्दर लघु कथा i आपको बधाई I 

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