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विनय कुमार
  • Male
  • Varanasi , U P
  • India
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विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-35
"प्रदत्त विषय पर बहुत बढ़िया रचना के लिए बहुत बहुत बधाई आ सुरेंद्र नाथ सिंह जी"
Feb 28
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-35
"बहुत बहुत आभार आ महेंद्र कुमार जी, आपके सुझाव के अनुसार सोचता हूँ"
Feb 28
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-35
"बहुत बहुत आभार आ प्रतिभा पांडे जी"
Feb 28
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-35
"बहुत बहुत आभार आ जानकी वाही जी"
Feb 28
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-35
"बहुत बहुत आभार आ तस्दीक अहमद खान साहब"
Feb 27
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-35
"जी सहमत हूँ आपसे, आभार आदरणीय"
Feb 27
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-35
"वाह, बहुत खूबसूरत रचना प्रदत्त विषय पर, इसी की जरुरत है आज के समाज में. बहुत बहुत बधाई आ जानकी वाही जी"
Feb 27
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-35
"बहुत बढ़िया रचना विषय पर, हालाँकि कल्पना कुछ ज्यादा ही हो गई. बहरहाल बधाई इस रचना के लिए आ सीमा सिंह जी"
Feb 27
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-35
"रचना को सराहने के लिए बहुत बहुत आभार आ शेख शहजाद साहब"
Feb 27
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-35
"बहुत बहुत आभार आ योगराज प्रभाकर सर"
Feb 27
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-35
"रचना को इतनी बारीकी से पढ़ने और विवेचना करने के लिए बहुत बहुत आभार आ समर कबीर साहब. वैसे अब जंगल सडकों से पटा पड़ा है, हाँ एक समय था जब पगडंडियां हुआ करती थीं. आपकी दूसरी बात से सहमत हूँ कि स्थानीय को हटाया जा सकता है. आशा है आगे भी आप इसी तरह…"
Feb 27
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-35
"रचना को पसंद करने के लिए बहुत बहुत आभार आ सुरेंद्र नाथ सिंह जी"
Feb 27
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-35
"बहुत बहुत आभार आ ओम प्रकाश जी"
Feb 27
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-35
"रचना को सराहने के लिए बहुत बहुत आभार आ डॉ संगीता गाँधी जी"
Feb 27
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-35
"थोड़ी क्लिष्ट हो गयी रचना, और स्पष्ट करने की जरुरत है. बहरहाल बधाई इस प्रस्तुति पर आ मनन कुमार सिंह जी"
Feb 27
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-35
"बहुत प्रभावशाली रचना है आपकी प्रदत्त विषय पर, हक़ीक़त में यही सब घटित हो रहा है. लेकिन किसी न किसी को तो आगे आना ही होगा, बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिए आ डॉ संगीता गांधीजी"
Feb 27

Profile Information

Gender
Male
City State
Johannesburg
Native Place
Varanasi
Profession
Banker
About me
पिछले कई सालों से लगातार पढ़ते रहने के बाद कुछ लिखने की प्रेरणा मिली तो लिखना प्रारम्भ किया |

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स्टेटस--लघुकथा

"सबको इस रिक्शे पर बैठना है और मन किया तो घूमना भी है", एक तरफ से आती आवाज सुनकर रवि ने उधर देखा. शादी के उस मंडप में वह विशिष्ट दर्जा प्राप्त व्यकि था, आखिर दामाद जो ठहरा. सामने कुछ दूर पर खड़ा रिक्शा दिख गया, वही सामान्य रिक्शा था, बस उसको खूब सजा दिया गया था. साफा बांधे एक आदमी भी वहां खड़ा था जिसे लोगों को घुमाने की जिम्मेदारी दी गयी थी. रवि ने वहां से जाने की कोशिश की लेकिन पत्नी ने हाथ पकड़ लिया "अरे सब बैठ रहे हैं तो हमको भी बैठना पड़ेगा".

बारी बारी से लोग रिक्शे पर बैठते, कोई थोड़ा…

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Posted on February 19, 2018 at 3:14pm — 10 Comments

यक़ीन क़ायम है—लघुकथा

“लगता है आपने दुनियाँ नहीं देखी और खबरों से दूर रहते हैं आप”, ज़हूर भाई ने अपनी बात तेज आवाज मे कही, गोया वह आवाज के ज़ोर पर ही अपनी बात सही बताना चाहते थे. वह नए नए पड़ोसी बने थे रफ़ीक़ के और हाल मे ही हुए कौमी दंगों पर बहस कर रहे थे. रफ़ीक़ उनको लगातार समझाने की कोशिश कर रहे थे कि वक़्त का तक़ाज़ा इन चीजों से ऊपर उठकर सोचने का है.

“आप जितनी तो नहीं देखी लेकिन कुछ तो देखी ही है ज़हूर भाई, दुनियाँ इतनी भी बुरी नहीं है. आज भी इंसानियत जिंदा है और मोहब्बत का खुलूस कायम है”, रफ़ीक़ ने मुसकुराते हुए जवाब…

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Posted on February 13, 2018 at 4:41pm — 8 Comments

जरुरत- लघुकथा

आज वह बहुत खुश थी, सारे गुलाब बिक गए थे. रात काफी हो चली थी और एक आखिरी गुलाब को पास रखकर वह पैसे गिनने में तल्लीन थी तभी एक कार उसके पास रुकी.

"वो गुलाब देना", अंदर से एक नवयुवक ने आवाज लगायी. उसने एक उड़ती हुई नजर युवक पर डाली और उसकी बात अनसुना करते हुए वापस पैसे गिनने में लग गयी.

"अरे सुना नहीं क्या, वो गुलाब तो दे, कितने पैसे देने हैं", युवक ने इस बार थोड़ी ऊँची आवाज में कहा, उसके स्वर में झल्लाहट टपक रही थी.

उसने सर उठाकर युवक को देखा और पैसे अपनी थैली में रखते हुए बोली…

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Posted on February 8, 2018 at 6:00pm — 14 Comments

जुनून--लघुकथा

बस आज की रात निकल जाए किसी तरह से, फिर सोचेंगे, यही चल रहा था उसके दिमाग में| दिन तो किसी तरह कट गया लेकिन रात तो जैसे हर अनदेखा और अनसोचा डर सामने लेकर आ खड़ी होती है और आज की रात तो जैसे अपनी पूरी भयावहता के साथ बीत रही थी| डॉक्टर की दी हुई हिदायत कि आज की रात बहुत भारी है, उसे रह रह कर डरा देती थी|

कितनी बार उसने दबे स्वर में मना भी किया था कि जिंदगी के प्रति इतने लापरवाह भी मत रहो| लेकिन राजन ने कभी सुनी थी उसकी, बस एक बड़े ठहाके में उसकी हर बात उड़ा देता| "जिंदगी उनका वरण करती है जो…

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Posted on January 17, 2018 at 3:00pm — 4 Comments

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At 1:14am on July 16, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय विनय जी 

At 4:37am on April 30, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें 

 
 
 

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