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विनय कुमार
  • Male
  • Varanasi , U P
  • India
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Neelam Upadhyaya commented on विनय कुमार's blog post हिचक--लघुकथा
"आदरणीय विनय कुमार जी, बहुत ही अच्छी रचना।  प्रस्तुति के लिए बधाई। "
21 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani commented on विनय कुमार's blog post हिचक--लघुकथा
"बहुत बढ़िया समापन के साथ बढ़िया रचना।हार्दिक बधाई आदरणीय विनय कुमार  जी।"
yesterday
Tasdiq Ahmed Khan commented on विनय कुमार's blog post हिचक--लघुकथा
"जनाब विनय कुमार साहिब , अन्दर की भावनाओं को दर्शाती सुंदर लघुकथा हुई है मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं l"
yesterday
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post हिचक--लघुकथा
"बहुत बहुत आभार आदरणीय मुहतरम जनाब समर कबीर साहब"
yesterday
Samar kabeer commented on विनय कुमार's blog post हिचक--लघुकथा
"जनाब विनय कुमार जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Wednesday
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post हिचक--लघुकथा
"बहुत बहुत आभार आ बसंत कुमार शर्मा जी"
Wednesday
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post हिचक--लघुकथा
"बहुत बहुत आभार आ तेजवीर सिंह जी"
Wednesday
TEJ VEER SINGH commented on विनय कुमार's blog post हिचक--लघुकथा
"हार्दिक बधाई आदरणीय विनय कुमार जी।बेहतरीन लघुकथा।अधिकांश रूढिवादी परिवारों में इस तरह की विसंगतियाँ प्रायः देखने को मिलती हैं।"
Wednesday
बसंत कुमार शर्मा commented on विनय कुमार's blog post हिचक--लघुकथा
"हिचक के साथ हिचकी का बहुत सुंदर उपयोग "
Wednesday
विनय कुमार posted a blog post

हिचक--लघुकथा

हिचक--"कभी बेटे को भी गले से लगा लिया कीजिये, वह भी आपके सीने से लगकर कुछ देर रहना चाहता है", रिमी ने गहरी सांस लेते हुए कहा. रमन को सुनकर तो अच्छा लगा लेकिन वह उसे दर्शाना नहीं चाहता था."ठीक है, इससे क्या फ़र्क़ पड़ जायेगा. वैसे भी तुम तो जानती हो कि मैं इन सब दिखावों में नहीं पड़ता", रमन ने अपनी तरफ से पूरी लापरवाही दिखाते हुए कहा. अंदर ही अंदर वह जानता था कि इसकी कितनी जरुरत है आजकल के माहौल में, लेकिन एक हिचक थी जो उसे रोकती थी."फ़र्क़ पड़ता है, आखिर उसके अधिकतर दोस्त तो अपने पिता से कितने…See More
Wednesday
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-39 (विषय: समीकरण")
"येन केन प्रकारेण-"तो फिर क्या सोचा आपने रघुबीर जी, इस बार किसके समर्थन से सरकार में जाने का सोच रहे हैं!", बच्चू खान ने हाथ में ग्लास को उठाते हुए कहा."आप तो जानते ही हैं बच्चू भाई, हम तो उसी तरफ रहते हैं जिधर सबसे बेहतर आसार रहते…"
Jun 30
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-39 (विषय: समीकरण")
"भाव तो समझ में आ रहे हैं लेकिन थोड़ी और स्पष्ट होनी चाहिए थी यह रचना. बहरहाल बधाई आपको आ मनन कुमार सिंह जी"
Jun 29
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-39 (विषय: समीकरण")
"भाव तो समझ में आ रहे हैं लेकिन थोड़ी और स्पष्ट होनी चाहिए थी यह रचना. बहरहाल बधाई आपको आ मनन कुमार सिंह जी"
Jun 29
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-39 (विषय: समीकरण")
"बड़े लोगों की छोटी हरकत, बहुत बढ़िया रचना विषय पर. कुछ नहीं कहते हुए भी सब कुछ कहती इस रचना के लिए बहुत बहुत बधाई आपको आ तेज वीर सिंघजी"
Jun 29
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-39 (विषय: समीकरण")
"बेटे और बेटी में फ़र्क़ कैसा, बहुत बढ़िया और सकारात्मक रचना विषय पर. बहुत बहुत बधाई आपको आ तस्दीक़ अहमद खान साहब"
Jun 29
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-39 (विषय: समीकरण")
"गरीब के घर बेटी का होना बहुत त्रासद हो सकता है, बहुत बढ़िया रचना विषय पर. बहुत बहुत बधाई आपको आ कनक हरलालका जी"
Jun 29

Profile Information

Gender
Male
City State
Johannesburg
Native Place
Varanasi
Profession
Banker
About me
पिछले कई सालों से लगातार पढ़ते रहने के बाद कुछ लिखने की प्रेरणा मिली तो लिखना प्रारम्भ किया |

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हिचक--लघुकथा

हिचक--

"कभी बेटे को भी गले से लगा लिया कीजिये, वह भी आपके सीने से लगकर कुछ देर रहना चाहता है", रिमी ने गहरी सांस लेते हुए कहा. रमन को सुनकर तो अच्छा लगा लेकिन वह उसे दर्शाना नहीं चाहता था.

"ठीक है, इससे क्या फ़र्क़ पड़ जायेगा. वैसे भी तुम तो जानती हो कि मैं इन सब दिखावों में नहीं पड़ता", रमन ने अपनी तरफ से पूरी लापरवाही दिखाते हुए कहा. अंदर ही अंदर वह जानता था कि इसकी कितनी जरुरत है आजकल के माहौल में, लेकिन एक हिचक थी जो उसे रोकती थी.

"फ़र्क़ पड़ता है, आखिर उसके अधिकतर दोस्त तो अपने…

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Posted on July 17, 2018 at 6:58pm — 9 Comments

मजदूर- कविता

एक बार फिर कंधे पर,

लैपटॉप बैग लटकाये,

वह अलस्सुब्ह निकल पड़ा.

रात को देर से आने पर,

हमेशा की तरह

नींद पूरी नहीं हुई थी,

जलती हुई आँखों,

और ऐठन से भरे शरीर,

को घसीटता हुआ वह,

जल्दी जल्दी बस स्टॉप की तरफ

भागने की कोशिश कर रहा था.

कल रात की बॉस की डांट,

उसे लाख चाहने के बाद भी,

भुलाते नहीं बन रही थी.

कहाँ सोचा था उसने पढ़ते समय,

कि यह हाल होगा नौकरी में.

कहाँ वह सोचता था कि उसे,

मजदूरी नहीं करनी…

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Posted on May 1, 2018 at 4:30pm — 2 Comments

स्टेटस--लघुकथा

"सबको इस रिक्शे पर बैठना है और मन किया तो घूमना भी है", एक तरफ से आती आवाज सुनकर रवि ने उधर देखा. शादी के उस मंडप में वह विशिष्ट दर्जा प्राप्त व्यकि था, आखिर दामाद जो ठहरा. सामने कुछ दूर पर खड़ा रिक्शा दिख गया, वही सामान्य रिक्शा था, बस उसको खूब सजा दिया गया था. साफा बांधे एक आदमी भी वहां खड़ा था जिसे लोगों को घुमाने की जिम्मेदारी दी गयी थी. रवि ने वहां से जाने की कोशिश की लेकिन पत्नी ने हाथ पकड़ लिया "अरे सब बैठ रहे हैं तो हमको भी बैठना पड़ेगा".

बारी बारी से लोग रिक्शे पर बैठते, कोई थोड़ा…

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Posted on February 19, 2018 at 3:14pm — 10 Comments

यक़ीन क़ायम है—लघुकथा

“लगता है आपने दुनियाँ नहीं देखी और खबरों से दूर रहते हैं आप”, ज़हूर भाई ने अपनी बात तेज आवाज मे कही, गोया वह आवाज के ज़ोर पर ही अपनी बात सही बताना चाहते थे. वह नए नए पड़ोसी बने थे रफ़ीक़ के और हाल मे ही हुए कौमी दंगों पर बहस कर रहे थे. रफ़ीक़ उनको लगातार समझाने की कोशिश कर रहे थे कि वक़्त का तक़ाज़ा इन चीजों से ऊपर उठकर सोचने का है.

“आप जितनी तो नहीं देखी लेकिन कुछ तो देखी ही है ज़हूर भाई, दुनियाँ इतनी भी बुरी नहीं है. आज भी इंसानियत जिंदा है और मोहब्बत का खुलूस कायम है”, रफ़ीक़ ने मुसकुराते हुए जवाब…

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Posted on February 13, 2018 at 4:41pm — 8 Comments

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At 1:14am on July 16, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय विनय जी 

At 4:37am on April 30, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें 

 
 
 

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