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"अब गांव चलें बहुत दिन बिता लिए यहाँ", शोभाराम ने जब पत्नी ललिता से कहा तो जैसे उनके मुंह की बात ही छीन ली.
लेकिन बेटे और बहू से क्या कहेंगे, गांव पर तो कोई रहता नहीं था,पट्टीदारों के अलावा. वैसे वहां पर अपने हिसाब से जीने की आज़ादी थी लेकिन यहाँ भी तो है ही, कोई बंधन नहीं है. उनके दिमाग में कई दिनों से यह सब घूम रहा था.
"अच्छा यह बताओ, आखिर क्या कह कर गांव जाओगे. बेटा तो यही कहकर शहर लाया था कि गांव में अकेले रहते हैं, कौन है जो आपका अकेलापन बाँटने के लिए", ललिता के सवाल पर लाजवाब हो गए शोभाराम.
बात भी सही थी, न तो बहू का वर्ताव ऐसा था जिससे कोई शिकायत की जा सके और न बेटे का. बच्चे भी रोज एकाध बार उनके पास आ ही जाते थे, ये अलग बात थी कि वे अपने फोन में ही कुछ दिखाने आते थे.
आखिर ललिता ने चुप्पी तोड़ी "लेकिन यह कौन सी बात है कि सब अपने फोन में ही लगे रहते हैं, न तो आपस में बात करते हैं और न हमसे. इससे तो अच्छे गांव में ही थे जहाँ पड़ोसी बातचीत तो करते थे".
शोभाराम ने सहमति में गर्दन हिलायी और कुछ बोलते उसके पहले ही बहू आयी "आपकी चाय ठंडी हो रही है पिताजी", और फोन को देखते हुए बाहर निकल गयी.
शोभाराम ने ललिता को देखा और दोनों धीरे धीरे अपने कमरे से बाहर आ गए. सोफे पर बैठे हुए बेटे के हंसने की आवाज आ रही थी, कोई चुटकुला पढ़ लिया था उसने अपने फोन में.
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on September 23, 2019 at 5:25pm

इस टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार आ बृजेश कुमार 'ब्रज' जी

Comment by विनय कुमार on September 23, 2019 at 5:25pm

इस टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार आ तेज वीर सिंह जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 21, 2019 at 12:54pm

सीधे और साधारण ढंग से आपने बहुत ही गहरी बात कही है आदरणीय...

Comment by TEJ VEER SINGH on September 20, 2019 at 8:02pm

हार्दिक बधाई आदरणीय विनय कुमार जी। बेहतरीन लघुकथा।

Comment by विनय कुमार on September 20, 2019 at 6:29pm

इस टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार आ मुहतरम समर कबीर साहब

Comment by Samar kabeer on September 19, 2019 at 3:44pm

जनाब विनय कुमार जी आदाब,अच्छी लघुकथा हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

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