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अलग फ़िक्र --लघुकथा

"क्या बहन, कल से बंदी ख़तम हो जायेगी?, एक बाई ने अपने दरवाजे से सामने वाले घर की बाई से पूछा.
"पता नहीं रे, हो सकता हैं ख़तम हो जाए", उसने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की.
"अच्छा तो ये बताओ कि क्या बंदी ख़त्म होते ही दारू की दुकान भी खुल जायेगी?, पहली ने फिर पूछा.
दूसरी ने लगभग घबराते हुए कहा "ख़तम नहीं होता तो अच्छा था".


मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on May 4, 2020 at 11:27am

इस हौसला बढ़ाती टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार आ सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' साहब

Comment by विनय कुमार on May 4, 2020 at 11:27am

इस हौसला बढ़ाती टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार आ समर कबीर साहब

Comment by विनय कुमार on May 4, 2020 at 11:26am

इस हौसला बढ़ाती टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार आ लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी

Comment by Samar kabeer on May 3, 2020 at 1:01pm

जनाब विनय कुमार जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by नाथ सोनांचली on May 3, 2020 at 11:41am

आद0 विनय कुमार सिंह जी सादर अभिवादन। कम शब्दों में ज्यादा बातें ,, ग़ज़ज़्ब । मजा आ गया। ग़ज़लों की भाँति इशारों इशारों में आपकीलघुकथा वाकई सम्पूर्ण है। बधाई स्वीकारें। सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 2, 2020 at 7:27pm

आ. भाई विनय कुमार जी, निर्धन परिवार की अधिसंख्य महिलाओं की पीड़ा उजागर करती कथा के लिए हार्दिक बधाई ।

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