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नज़र झुकाई जो इक बार तो उठा न सके- ग़ज़ल

1212 1122 1212 112/22

वो मेरे सामने आने पे मुस्कुरा न सके

नज़र झुकाई जो इक बार तो उठा न सके

 

हज़ार कोशिशें की रश्क़ तो छुपा न सके

मगर हँसी में मेरी बात भी उड़ा न सके

 

उन्होंने जिक्र मेरा छेड़ तो दिया सरे बज़्म

वही बातें मेरे होते वो दोहरा न सके

 

हर एक सम्त से नज़रें उठीं हमारी तरफ

कि कहते कहते भी वो हालेदिल सुना न सके

 

बस एक रोज़ की थी ज़िन्दगानी फूलों की

वो बदनसीब रहे जो चमन सजा न सके

 

न पूछिये मेरी बेचारगी का आलम, आह!

कि आते आते भी ये अश्क़ बाहर आ न सके

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by rajesh kumari on June 4, 2015 at 11:48am

बहुत खूब सूरत ग़ज़ल है शिज्जू भैया ,आ० समीर भाई जी की बात से सहमत हूँ उन्होंने मिसरों को हल भी बता दिया जो स्वागत योग्य है 

)"वही बातें मेरे होते वो दोहरा न सके"---मगर  वो लफ़्ज मेरे होते  दोहरा न सके ..ऐसे भी  कर सकते हैं 

बस एक रोज़ की थी ज़िन्दगानी फूलों की

वो बदनसीब रहे जो चमन सजा न सके---लाजबाब 

बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई दिल से दाद कबूलिये  

Comment by Samar kabeer on June 4, 2015 at 10:55am
जनाब शिज्जु "शकूर" जी,आदाब,बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने ,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ,दो मिसरों की तरफ़ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा :-

(1)"वही बातें मेरे होते वो दोहरा न सके"

इस मिसरे में लय बाधित हो रही है ,इसे इस तरह कर लें तो बहतर होगा :-

"प मेरे सामने बातें वो दोहराना न सके"

(2)" कि आते आते भी ये अश्क़ बाहर आ न सके"

इस मिसरे में भी लय बाधित हो रही है,इसे इस तरह कर लें :-

"कि आते आते भी बाहर ये अश्क आ न सके"
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 3, 2015 at 11:12pm

अहहाहा! दिल बस गुनगुनाये जा रहा है!रंग चढ़ गया है इस गजल का! लाजवाब! लाजव़ाब!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 3, 2015 at 11:07pm

बहुत ही दिलकश गजल हुयी है आदरणीय शिज्जू सर! अभिनन्दन!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 3, 2015 at 10:23pm

आ० शिज्जू भाई

आपकी गजलो से ही सीख रहा हूँ. बेहतरीन प्रस्तुति .

Comment by maharshi tripathi on June 3, 2015 at 7:25pm

बस एक रोज़ की थी ज़िन्दगानी फूलों की

वो बदनसीब रहे जो चमन सजा न सके

  न पूछिये मेरी बेचारगी का आलम, आह!

कि आते आते भी ये अश्क़ बाहर आ न सके,,,,,,वाह  ,,प्रणाम आपको आ. शिज्जु "शकूर" जी ,,कमाल की गजल है |

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