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बचपन भटक रही है ( कविता )


हैरी पोर्टर की दुनिया में
वो रहता मसगूल
नोमिता और सिंगचेन बनकर
ही होना है मशहूर
वो कहता है माँ से
मुझे चाहिए माॅसमेलो
चावल दाल भूल कर
बन गया राईस केक का फैलो
खीर हलवा पूरी
अब हुई पुरानी बात
करना हो तो करो चाऊमिन पिज़्ज़ा
रोल वोल की बात
माँ बन गई माॅम
पापा का तो काम तमाम
ऐश और पिकाचू लेकर
याद रहा बस पोकीमोन
स्पाइडर मैन का जादू
ऐसा सर चढकर बोला
सुपर मैन और आयरन मैन
से एवेंजेर तक
सबका बन गया चेला
कहाँ गये विवेकानन्द ,
नेताजी सुभाष चंद्र से हीरो
बन गये इनके आदर्श
अब फिल्मिया हीरो
घट रहा है घुट रहा है
मासूमियत बचपन की
स्वभाव में रह गया बस
हरकत विडियो गेम सी
भटक रही है मरूभूमि में
मृगतृष्णा सी बचपन
सच की जमीन सरक गई
लड़कपन जिये उम्र पचपन


कान्ता राॅय
भोपाल
मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Saurabh Pandey on July 4, 2015 at 10:00pm

इस अच्छी कोशिश केलिए बधाइयाँ, आदरणीया..

सादर

Comment by kanta roy on June 15, 2015 at 7:59am
आभार आपको आदरणीय कृष्णा मिश्रा जान गोरखपूरी जी रचना पसंदगी के लिये ।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 14, 2015 at 10:05pm

बहुत ही लाजवाब कविता!हार्दिक बधाई आ० कांता जी!

Comment by kanta roy on June 13, 2015 at 12:33pm
हृदय तल से आभार आपको आदरणीय समर कबीर जी मेरा हौसला वर्धन करने के लिए
Comment by Samar kabeer on June 13, 2015 at 10:52am
मोहतरमा कांता रॉय जी,आदाब,सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।
Comment by kanta roy on June 12, 2015 at 8:34pm
आभार आपको आदरणीय डा. गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी कविता को सराहने के लिये ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 12, 2015 at 8:06pm

आ० कांता जी

बहुत बढ़िया -वास्तविक चित्रण .  

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