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सड़क के बीचो –बीच नन्ही सी कोपल को पैर तले आते देख मनीष सिहर गया था .क्या करने जा रहा था .तपती धरा ,गर्म हवा ,पथरीली जमीन पर पसरा पिघला डामर,अंगुल बराबर हैसियत पर टक्कर इनसब से.सीना ताने उस हरीतिमा की जिजीविषा ने उसे हिम्मत से लबरेज कर दिया कि वह मजबूती से घर में सबसे बोल सके कि गर्भ में बेटी है तो क्या वह उसे पोषित करेगा .जिबह के लिए जाती बकरी सम उसकी पत्नी खिल गयी और कभी जुबान नहीं खोलने वाले बेटे के जुर्रत पर माता पिता थम गए .नेपथ्य में नन्हा अंकुर एक बड़े से फलदार पादप में परिवर्तित होता दिख रहा था .

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Rita Gupta on June 16, 2015 at 10:32am

आदरणीय केवल जी रचना पर आपकी राय हेतु धन्यवाद .

Comment by Rita Gupta on June 16, 2015 at 10:31am

आदरणीय कांता जी आभारी हूँ आपके कमेंट्स पर 

Comment by Rita Gupta on June 16, 2015 at 10:30am

आदरणीय शरदिंदु जी ,मार्गदर्शन के लिए बहुत आभार .आपके सुझाव पर मैं अमल करुँगी ,आभार 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 16, 2015 at 9:55am

समझदार को इशारा ही काफी है...हार्दिक बधाई स्वीकारे. आ0 रीता जी, सादर

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 16, 2015 at 7:42am

सार्थक लघुकथा पर बधाई आ० रीता गुप्ता जी!

Comment by kanta roy on June 16, 2015 at 7:27am
बहुत ही सुंदर लघुकथा लिखी है आपने आदरणीया रीता गुप्ता जी ॥

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on June 16, 2015 at 3:03am
आदरणीया रीता जी, बहुत अच्छे विचार और उनको अभिव्यक्त करने का ईमानदार प्रयास जिसके लिए आपको साधुवाद देता हूँ. //....वह मजबूती से घर में सबसे बोल सके कि गर्भ में बेटी है तो क्या वह उसे पोषित करेगा // में 'क्या' के बाद विरामचिह्न होने से आप जो कहना चाहती हैं वह और स्पष्ट हो जाता.
Comment by Rita Gupta on June 15, 2015 at 10:56pm

धन्यवाद शशि जी आभार 

Comment by shashi bansal goyal on June 15, 2015 at 10:36pm
वाह आद0 rita gupta जी ।बहुत सार्थक रचना हुई है । बधाई आपको ।
Comment by Rita Gupta on June 15, 2015 at 10:32pm

धन्यवाद डा गोपाल नारायण जी ,आपकी सलाह को अमल में लाने की कोशिश करुँगी .हार्दिक आभार .

 

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