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प्रश्नचिह्न के घेरे में (लघुकथा )

"तुमने जन्म देकर कोई एहसान नहीं किया है ..! क्या हमनें कहा था कि हमें इस दुनिया में लाओ ..? एक ब्रांडेड टी - शर्ट के लिए तो तरसते है हम .... अगर परवरिश करने की ताकत नहीं थी तो पैदा करने से पहले सोचना था ना ... अब हमारा क्या ...? "
"इसलिए तो सब घरबार बेचकर तुम्हारा एडमिशन इतने बडे़ काॅलेज में करवाया है कि तुम अपने बच्चों को वो सब दो जो हम ना दे सकें तुम्हें । "
"कितना शर्मिंदा होता हूँ वहाँ कालेज में इन साधारण कपडों में ... कितना अच्छा होता कि मै पढ़ाई ही नहीं करता ..! "


कान्ता राॅय
भोपाल
मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by kanta roy on June 18, 2015 at 10:25pm
बहुत आभार आपको आदरणीय महर्षि त्रिपाठी जी कथा पर नजर करने के लिए । दो संवादों के मध्य बीच के स्पेस का ना होना ही कथा को समझने में दिक्कत का कारण बना । आगे से मै ध्यान रखूँगी इस बात का
Comment by kanta roy on June 18, 2015 at 10:21pm
ये बातें किसी ना किसी रूप से लगभग सभी को ही अक्सर सुनने को मिल ही जाती है । माता पिता को जितना महान किताबों में कहानियों में पढा जाता है उसके बिलकुल विपरीत की परिस्थितियाँ बनती है हकीकत की दुनिया में जिसका परिणाम वृद्धाआश्रमों का शहरों में तेजी से बढना । यह एक संस्कार हनन की पराकाष्ठा ही है कि जन्मदाता ही कठघरे में घिर जाता है प्रश्नों के ... कि क्या हमारी परिस्थितियाँ ना रहे बच्चों को समस्त सुविधा पूर्ण करने में तो क्या हमें उन्हे जन्म नहीं देना चाहिए ...???
आभार आपको तहे दिल से डा. गोपल नारायण श्रीवास्तव जी कथा पसंदगी के लिए । नमन
Comment by maharshi tripathi on June 18, 2015 at 7:05pm

आ. kanta roy जी ,,बढ़िया लघुकथा हुई है ,,आप वाक्यों के आगे कौन ,किससे कह रहा है ,,,स्पष्ट करें तो और सुन्दर हो ,,,सायद ऐसा मुझे लग रहा हो |

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 18, 2015 at 6:47pm

मैंने कही पढ़ा था ---रावण  जैसा विद्वान कहता है , पिता  वह मूर्ख प्राणी है जो अपने दुश्मनों को पाल पोस कर बड़ा करता है . इस कथन में कितना सत्य है यह सोचने की बात है आपके सारे  वात्सल्य , दुलार और बलिदान की धज्जी बेटा एक ही प्रश्न में उधेड़ देता है आपने जिदगी में मेरे लिए किया ही क्या ?-----------पर वह बेटा भी कभी  बाप बनता है सिर्फ पछताने के लिए.  आपकी कहानी इस मूलभूत प्रश्न को बड़े सलीके से उठाती है . सादर.  

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