For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

विरह-हंसिनी हवा के झोंके

श्वेत पंख लहराए रे !

आज हंसिनी निठुर, सयानी

निधड़क उड़ती जाए रे !

 

अब तो हंसिनी, नाम बिकेगा

नाम जो सँग बल खाए रे !

होके बावरी चली अकेली

लाज-शरम ना आए रे !

 

धौराहर चढ़ राज-हंसनी,

किससे नेह लगाए रे !

कोटर आग जले धू-धूकर  

क्यों न उसे बुझाए रे !

 

ओरे ! हंसिनी, रंगमहल से

कहाँ तू नयन उठाए रे !

जिस हंसा के फाँस-फँसी

कोई उसका सच ना पाए रे !

 

सच तो एक ही, सुन रे, बतंगड़ !

तू ही भरम फैलाए रे !

क्षिति, जल, अनल, गगन, पवन

वही एक करत बिखराए रे !

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

-- संतलाल करुण 

Views: 1066

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 12, 2015 at 10:16pm

आ. सन्तलाल करुणजी, मेर कहे को मान देने केलिए सादर धन्यवाद

Comment by Santlal Karun on July 12, 2015 at 7:10pm

आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी,

जैसा कि आप ने सुझाया, मैंने रचना को पद-बंध रूप में व्यवस्थित कर दिया है | सुझाव और रचना के प्रति श्लाघात्मक प्रतिक्रिया  के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ! 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2015 at 11:36pm

गीत सुन्दर है आदरणीय. निर्गुण की भावाभिव्यक्ति सरस धार में बही है. 

लेकिन इस रचना को शब्द की पंक्तियाँ क्यों दे दिये ? इसे देखिये -

विरह-हंसिनी  हवा के झोंके
श्वेत पंख लहराए रे !

आज हंसिनी निठुर, सयानी
निधड़क उड़ती जाए रे !

अब तो हंसिनी, नाम बिकेगा
नाम जो सँग बल खाए रे !

अब तो हंसिनी नाम बिकेगा
नाम जो सँग बल खाए रे !

होके बावरी चली अकेली
लाज-शरम ना आए रे !

धौराहर चढ़ राज-हंसनी,
किससे नेह लगाए रे !

कोटर आग जले धू-धूकर  
क्यों न उसे बुझाए रे !

ओरे ! हंसिनी, रंगमहल से
कहाँ तू नयन उठाए रे !

जिस हंसा के फाँस-फँसी
कोई  उसका सच ना पाए रे !

सच तो एक ही, सुन रे, बतंगड़ !
तू ही भरम फैलाए रे !

क्षिति, जल, अनल, गगन, पवन
वही एक करत बिखराए रे !

Comment by Santlal Karun on June 25, 2015 at 6:12pm

आदरणीय आदित्य कुमार जी,

श्लाघात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

Comment by Santlal Karun on June 25, 2015 at 6:10pm

आदरणीय हरी प्रकाश जी,

रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार !

Comment by Santlal Karun on June 25, 2015 at 6:08pm

आदरणीय कांता मैडम,

रचना की प्रशंसा के लिए सहृदय आभार !

Comment by Santlal Karun on June 25, 2015 at 6:07pm

आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी.

प्रशंसात्मक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

Comment by Aditya Kumar on June 24, 2015 at 6:55pm

सुन्दर रचना के लिए बधाई स्वीकार करें आदरणीय श्री Santlal Karun जी 

Comment by Hari Prakash Dubey on June 24, 2015 at 5:53pm

आदरणीय संतलाल करुण जी 

सच तो एक ही,

सुन रे, बतंगड़ !

तू ही भरम

फैलाए रे !

क्षिति, जल, अनल,

गगन, पवन

वही एक करत

बिखराए रे !...............सुन्दर रचना , बधाई  प्रेषित ! सादर  

Comment by kanta roy on June 24, 2015 at 5:24pm
ओरे ! हंसिनी,
रंगमहल से
कहाँ तू  
नयन उठाए रे !
जिस हंसा के
फाँस-फँसी
कोई  उसका सच
ना पाए रे ............. बहुत सुंदर मनोरम विरह की आग हँसनी किससे नेह लगाए रे .... बधाई इस सुंदर रचना आदरणीय संतलाल जी

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
11 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Saturday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Jul 14
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Jul 11
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service