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परपोते की चाह (लघुकथा)

बुढ़िया दादी बिस्तर पर पड़ी-पड़ी अपनी अंतिम साँसें गिन रही है. डॉ. साहब आते हैं, देखते हैं दवा देते हैं, कभी कोई इंजेक्शन भी चढ़ा देते हैं. डॉक्टर से धीरे धीरे बुदबुदाती है. – “बेटा, बंटी  से कहो न, जल्द से जल्द ‘परपोते’ का मुंह दिखा दे तो चैन से मर सकूंगी. मेरी सांस परपोते की चाह में अंटकी है."

बच्चे की जल्दी नहीं, (विचार वाला) बंटी अपनी कामकाजी पत्नी की तरफ देख मुस्कुरा पड़ा. 

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 5, 2015 at 12:35pm

आदरणीया परी जी, उत्साह वर्धन हेतु आपका हार्दिक अन्हार!

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 5, 2015 at 12:30pm

आदरणीय कृष्ण मिश्र जी, सादर अभिवादन! मैं समझ सकता हूँ, लघुकथा की पञ्च लाइन उतनी जानदार नहीं हो सकी ...आगे से और कोशिश करूंगा, आपकी सुझाव और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार!

Comment by Pari M Shlok on July 4, 2015 at 10:12am
बधाई आपको बहुत उम्दा प्रस्तुति
Comment by Pari M Shlok on July 4, 2015 at 10:12am
बधाई आपको बहुत उम्दा प्रस्तुति
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on July 3, 2015 at 8:51pm

सुन्दर! लघुकथा बधाई आदरणीय!

बच्चे की जल्दी नहीं, (विचार वाला) बंटी अपनी कामकाजी पत्नी की तरफ देख मुस्कुरा पड़ा.

इस पंक्ति के और बेहतर होने की संभावना रह गयी है!

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